देश की खबरें | जेएनयू छात्र संघ चुनाव में वामपंथियों का दबदबा बरकरार, एबीवीपी को मिला संयुक्त सचिव पद

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. जवाहरलाल नेहरू छात्र संघ (जेएनयूएसयू) चुनाव में वामपंथी उम्मीदवारों ने केंद्रीय पैनल के चार पद में से तीन पर जीत हासिल कर विश्वविद्यालय में अपना दबदबा बरकरार रखा, जबकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से संबद्ध अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) ने संयुक्त सचिव पद जीता।

नयी दिल्ली, 28 अप्रैल जवाहरलाल नेहरू छात्र संघ (जेएनयूएसयू) चुनाव में वामपंथी उम्मीदवारों ने केंद्रीय पैनल के चार पद में से तीन पर जीत हासिल कर विश्वविद्यालय में अपना दबदबा बरकरार रखा, जबकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से संबद्ध अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) ने संयुक्त सचिव पद जीता।

एबीवीपी ने नौ साल के अंतराल के बाद कोई पद हासिल किया है।

जेएनयू छात्र संघ निर्वाचन आयोग द्वारा सोमवार को घोषित किए गए परिणाम के अनुसार ‘ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन’ (आइसा) के नीतीश कुमार ने 1,702 वोट हासिल कर अध्यक्ष पद पर जीत हासिल की।

उनकी निकटतम प्रतिद्वंद्वी एबीवीपी की शिखा स्वराज को 1,430 वोट मिले, जबकि ‘स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया’ (एसएफआई) समर्थित तैयब्बा अहमद को 918 वोट मिले।

‘डेमोक्रेटिक स्टूडेंट्स फेडरेशन’ (डीएसएफ) की मनीषा ने 1,150 वोट हासिल कर उपाध्यक्ष पद जीता, जबकि एबीवीपी के निट्टू गौतम को 1,116 वोट मिले।

डीएसएफ की मुन्तेहा फातिमा ने 1,520 वोट हासिल कर महासचिव पद पर जीत हासिल की, जबकि एबीवीपी के कुणाल राय को 1,406 वोट मिले।

संयुक्त सचिव पद पर एबीवीपी के वैभव मीणा ने 1,518 वोट प्राप्त कर जीत दर्ज की। उनके निकटतम प्रतिद्वंद्वी आइसा के नरेश कुमार को 1,433 और ‘प्रोग्रेसिव स्टूडेंट्स एसोसिएशन’ (पीएसए) की उम्मीदवार निगम कुमारी को 1,256 वोट मिले।

मीणा की जीत के साथ एबीवीपी ने नौ साल बाद केंद्रीय पैनल में जगह बनाई है। इससे पहले 2015-16 में सौरव शर्मा ने इसी पद पर जीत हासिल की थी। एबीवीपी ने 2000-01 में अध्यक्ष पद पर जीत हासिल की थी, जब संदीप महापात्रा विजयी हुए थे।

एबीवीपी के राष्ट्रीय महासचिव वीरेंद्र सोलंकी ने कहा कि जेएनयू में राष्ट्रवाद की नयी सुबह हुई है। उन्होंने कहा, ‘‘आज कैंपस में इतिहास रचा गया है। वामपंथी विचारधारा की दीवारें अब छात्रों के लोकतांत्रिक फैसले से ढह गई हैं।’’

एबीवीपी ने जेएनयू छात्र संघ चुनावों में विभिन्न स्कूलों और विशेष केंद्रों में काउंसलर की 44 सीट में से 24 पर भी जीत दर्ज की। इसका अर्थ यह है कि परिषद में प्रस्ताव पारित करने में एबीवीपी की अधिक भूमिका होगी।

इस बार के चुनाव में आइसा ने डीएसएफ के साथ गठबंधन किया था जबकि एसएफआई और ‘ऑल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन’ (एआईएसएफ) ने ‘बिरसा आंबेडकर फुले स्टूडेंट्स एसोसिएशन’ (बीएपीएसए) और पीएसए के साथ गठबंधन किया।

एबीवीपी ने अकेले ही चुनाव लड़ा।

आइसा ने संयुक्त सचिव पद पर एबीवीपी उम्मीदवार की बहुत कमों मतों के अंतर से जीत पर चिंता जताई और इसे परिसर में वामपंथ के प्रभुत्व को चुनौती बताया।

भाकपा(मार्क्सवादी-लेनिनवादी) समर्थित आइसा ने एक बयान में कहा, ‘‘यह वास्तव में चिंता का विषय है कि एबीवीपी ने संयुक्त सचिव पद पर 85 वोटों के अंतर से जीत हासिल की है।’’

इसने गठबंधन की जीत को केंद्र की नयी शिक्षा नीति के खिलाफ जनादेश बताया।

वहीं, इसके विपरीत एबीवीपी ने अपनी जीत को ‘‘जेएनयू के राजनीतिक परिदृश्य में एक ऐतिहासिक बदलाव’’ बताया और कहा कि इसने वामपंथियों के ‘‘तथाकथित गढ़’’ को भेद दिया है।

नवनिर्वाचित संयुक्त सचिव मीणा ने कहा, ‘‘मैं इस जीत को अपनी व्यक्तिगत उपलब्धि के रूप में नहीं देख रहा हूं, बल्कि यह आदिवासी चेतना और राष्ट्रवादी विचारधारा की एक बड़ी और शानदार जीत है।’’

मीणा ने कहा, ‘‘यह जीत सिर्फ मेरी नहीं है, बल्कि हर उस छात्र की जीत है जो हमारे राष्ट्र के पुनर्निर्माण और सांस्कृतिक पहचान को बढ़ावा देने के लिए शिक्षा की शक्ति में विश्वास करता है।’’

मीणा राजस्थान के करौली के रहने वाले हैं और एक आदिवासी कृषक परिवार से हैं।

जेएनयू छात्र संघ चुनाव के लिए 25 अप्रैल को 7,906 पात्र विद्यार्थियों में से 5,500 ने अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया। इस बार का मतदान प्रतिशत 2023 में दर्ज 73 प्रतिशत से थोड़ा कम था, हालांकि 2012 के बाद अधिक मतदान प्रतिशत वाले चुनावों में इस बार का चुनाव भी शामिल है।

चार केंद्रीय पैनल पदों के लिए 29 उम्मीदवार तथा 44 काउंसलर सीट के लिए 200 उम्मीदवार मैदान में थे।

जेएनयू छात्र संघ के नवनिर्वाचित अध्यक्ष नीतीश कुमार ने ‘पीटीआई वीडियो’ से कहा, ‘‘यह परिसर को नुकसान पहुंचाने की कोशिश कर रही सरकार के खिलाफ जनादेश है। यह मौजूदा सरकार की नीतियों के खिलाफ जनादेश है।’’

उन्होंने कहा, ‘‘साफ देखा गया है कि किस तरह से जेएनयू को अवंटित की जाने वाली निधि में कटौती की जा रही है और बुनियादी ढांचे को बर्बाद किया जा रहा है। यह (चुनाव का नतीजा) ऐसी विनाशकारी नीतियों के खिलाफ एक कड़ा संदेश है। सरकार को इन कार्रवाइयों को रोकना चाहिए और जेएनयू को वह देना शुरू करना चाहिए जिसका वह हकदार है।’’

(यह सिंडिकेटेड न्यूज़ फीड से अनएडिटेड और ऑटो-जेनरेटेड स्टोरी है, ऐसी संभावना है कि लेटेस्टली स्टाफ द्वारा इसमें कोई बदलाव या एडिट नहीं किया गया है)

Share Now