विजयपुरा (कर्नाटक), दो जनवरी विद्वतापूर्ण प्रवचनों और प्रभावशाली वक्ता के रूप में प्रसिद्ध ज्ञानयोगश्रम के संत सिद्धेश्वर स्वामी के पार्थिव शरीर का मंगलवार को पूरे राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया। लोगों ने आध्यात्मिक नेता को अंतिम श्रद्धांजलि दी।
82 वर्षीय संत कुछ समय से उम्र संबंधी बीमारियों से जूझ रहे थे और सोमवार की शाम उन्होंने अंतिम सांस ली।
राज्य के विभिन्न हिस्सों से विजयपुरा में लाखों लोगों की भीड़ उमड़ी। पड़ोसी राज्यों से भी कुछ लोग संत को अंतिम विदाई देने के लिए आए थे जिन्हें वे ‘‘नादेडदुवा देवारू’’ (जीवित देवता) मानते थे।
कई लोगों ने तो अपने प्रिय ‘‘सिद्धेश्वर अप्पाव्रु’’ को अश्रुपूर्ण विदाई भी दी। संत के भक्त और अनुयायी कर्नाटक, महाराष्ट्र और अन्य राज्यों में भी फैले हुए हैं।
उनका अंतिम संस्कार उनकी इच्छा के अनुसार ज्ञानयोगश्रम में किया गया, जिसे उन्होंने 2014 के ‘गुरु पूर्णिमा’ के दिन ‘‘अंतिम अभिवादन पत्र’’ शीर्षक वाली वसीयत के रूप में दर्ज किया था।
गवाहों के रूप में दो जिला न्यायाधीशों द्वारा हस्ताक्षरित इस वसीयत में कहा गया है कि उनके नश्वर अवशेषों का दाह संस्कार किया जाए और उसे दफनाया नहीं जाए, कोई धार्मिक अनुष्ठान नहीं किया जाए तथा उनकी अस्थियों को नदी या समुद्र में विसर्जित किया जाए और उनकी स्मृति में कोई स्मारक या उनकी स्मृति भवन बनाया जाए।
मृदुभाषी और सरल दिखने वाले, स्वामीजी ‘‘बहुत ही सरल’’ थे।
आश्रम में अंतिम संस्कार से पहले यहां सैनिक स्कूल परिसर में तिरंगे में लिपटे स्वामीजी के पार्थिव शरीर को कर्नाटक सरकार और पुलिस ने सलामी दी।
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