देश की खबरें | कर्नाटक: विधायकों, विधान परिषद सदस्यों के कैबिनेट दर्जे को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई 21 को
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बेंगलुरु, 14 फरवरी कर्नाटक उच्च न्यायालय ने 42 विधायकों और विधान परिषद सदस्यों (एमएलसी) को कैबिनेट मंत्री का दर्जा देने के राज्य सरकार के फैसले को चुनौती देने वाली एक जनहित याचिका पर अगली सुनवाई के लिए शुक्रवार को 21 फरवरी की तारीख तय की।
यह याचिका कर्नाटक राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड में कार्यरत बेंगलुरु निवासी सूरी पायला ने दायर की है।
पायला ने दलील दी है कि इन विधायकों और विधान परिषद सदस्यों को कैबिनेट मंत्री का दर्जा दिए जाने से उन्हें उच्च वेतन, सरकारी वाहन, ड्राइवर, ईंधन भत्ता, मकान किराया भत्ता (एचआरए) और चिकित्सा प्रतिपूर्ति जैसे वित्तीय लाभ मिलते हैं।
उन्होंने कहा है कि यह “लाभ का पद धारण करने” के समान है और भारतीय संविधान के अनुच्छेद-191 का उल्लंघन है, जो विधायकों और विधान परिषद सदस्यों को ऐसे पद धारण करने के लिए अयोग्य ठहराने का प्रावधान करता है।
याचिका मुख्य न्यायाधीश एनवी अंजारिया और न्यायमूर्ति एमआई अरुण की खंडपीठ के समक्ष पेश की गई, जिन्होंने अगली सुनवाई 21 फरवरी के लिए निर्धारित की।
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता जे साई दीपक ने कहा कि विधायकों और विधान परिषद सदस्यों को विभिन्न बोर्डों एवं निगमों के अध्यक्ष के रूप में नियुक्त करने पर कोई समस्या नहीं थी, लेकिन उन्हें कैबिनेट मंत्री का दर्जा देना संविधान के अनुच्छेद 164 (1 ए) का उल्लंघन है, जो सरकार के अनुचित विस्तार को रोकने के लिए मंत्रिपरिषद का आकार सीमित करता है।
याचिका में इस बात पर प्रकाश डाला गया है कि 26 जनवरी को राज्य सरकार ने एक अधिसूचना जारी कर 34 विधायकों और विधान परिषद सदस्यों को कैबिनेट दर्जा प्रदान किया, जबकि आठ विधायकों और विधान परिषद सदस्यों को पहले से ही कैबिनेट दर्जा हासिल था। इसमें कहा गया है कि एक ही अधिसूचना के जरिये इतनी बड़ी संख्या में विधायकों और विधान परिषद सदस्यों को कैबिनेट स्तर के पदों पर नियुक्त करना चिंता का विषय है।
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश अंजारिया ने अधिसूचना की व्यापक प्रकृति पर टिप्पणी करते हुए पूछा, “तो ये 34 नियुक्तियां एक ही दस्तखत पर हुईं। एक अधिसूचना से हुईं।”
वरिष्ठ अधिवक्ता दीपक ने इसकी पुष्टि की। इसके बाद अदालत ने सुनवाई को फिर से निर्धारित करने का सुझाव दिया, ताकि दीपक जो वीडियो कॉन्फ्रेंस के माध्यम से सुनवाई में शामिल हुए थे, व्यक्तिगत रूप से बहस कर सकें। इसके बाद मामले की सुनवाई 21 फरवरी तक के लिए स्थगित कर दी गई।
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