देश की खबरें | कपिला वात्स्यायन : कला के लिये जिनका जुनून आखिरी क्षण तक रहा

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एनडीआरएफ/प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credits: ANI)

नयी दिल्ली, 16 सितंबर कला, संस्कृति और सभ्यता के क्षेत्रों को अपने शोधकार्य से समृद्ध करने वाली महान कलाविद- डॉ कपिला वात्स्यायन का कोई सानी नहीं था और वह अपने आप कला संस्कृति के क्षेत्र में एक संस्थान थीं।

पद्म विभूषण पुरस्कार से सम्मानित विदुषी कपिला ने अपने करीब छह दशक का लंबा करियर नृत्य, कला, वास्तुकला और अन्य सहित कला के विभिन्न रूपों के इतिहास की गहराई में व्यतीत किया।

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दिल्ली स्थित आवास पर बुधवार को उनका निधन हो गया। वह 92 वर्ष की थीं।

उनके निधन को प्रख्यात लेखक अशोक वाजपेयी ने व्यक्तिगत क्षति बताते हुए कहा कि भारतीय संस्कृति ने कला को अथक प्रोत्साहन देने वाली हस्ती को खो दिया।

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वाजपेयी ने फेसबुक पर लिखा, “महान विदुषी, रचनात्मक व्यक्तित्व की धनी और संस्थान निर्माता कपिला वात्स्यायन के निधन पर मुझे गहरा दुख पहुंचा है। भारत में सांस्कृतिक जगत ने एक महान व्यक्तित्व को खो दिया। वह कला, विचार और कल्पना के बीच पुल बांधने वाली और इस क्षेत्र में अथक परिश्रम करने वाली महिला थीं। मेरे जैसे कई लोगों के लिए उनका जाना व्यक्तिगत क्षति है।”

प्रख्यात सरोद वादक अमजद अली खान ने कहा कि वात्स्यायन भारतीय शास्त्रीय नृत्य, कला, वास्तुकला और इतिहास की महान अध्येता थीं।

कपिला ने अपने जीवनकाल में 20 पुस्तकों के अलावा 200 से अधिक शोधपत्र लिखे।

उनकी कुछ प्रमुख कृतियों में द स्कवायर एंड द सर्कल ऑफ इंडियन आर्ट्स, भारत:द नाट्य शास्त्र, डांस इन इंडियन पेंटिंग और क्लासिकल इंडियन डांस इन लिटरेचर एंड आर्ट्स, ट्रांसमिशन एंड ट्रांसफोरमेशन :लर्निंग थ्रू द आर्ट्स इन एशिया शामिल हैं।

कपिला का जन्म 1928 में दिल्ली में हुआ था और उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में परास्नातक की डिग्री ली थी।

इसके अलावा उन्होंने शिक्षा के विषय में अमेरिका के मिशिगन विश्वविद्यालय से परास्नातक की पढ़ाई की तथा काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी से पीएचडी की डिग्री हासिल की थी।

उन्होंने देश विदेश में अध्यापन का कार्य भी किया।

वात्स्यायन, कवि और आलोचक केशव मलिक की छोटी बहन थीं।

उनका विवाह प्रख्यात कवि सच्चिदानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ से 1956 में हुआ था।

कपिला ने अच्छन महाराज के मार्गदर्शन में कत्थक, गुरू अमोबी सिंह के मार्गदर्शन में मणिपुरी नृत्य भी सीखा था। उन्होंने भरतनाट्यम और ओडिशी नृत्यों की भी शिक्षा ग्रहण की थी।

कला के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को लेकर वह इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र की 1987 में संस्थापक न्यासी बनी थी। वह 1993 से 2000 तक इसकी अकादमिक निदेशक भी रही।

फोटोग्राफी कलाकार पार्थिव शाह ने पीटीआई- से कहा, ‘‘उनका व्यवहार ऐसा था कि उनके साथ काम करने वाले सभी सरकारी अधिकारी उनका सम्मान करते थे और उन्हें गंभीरता से लेते थे, वह भी एक ऐसे वक्त में जब ज्यादातर पुरूष ‘महिला बॉस’ के साथ काम करने में असहज महसूस करते थे।’’

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