नयी दिल्ली, दो जून दिल्ली उच्च न्यायालय की न्यायाधीश न्यायमूर्ति मुक्ता गुप्ता ने शुक्रवार को कहा कि न्यायाधीश जब राहत देते हैं तो परोपकार नहीं करते हैं और यह वादी का अधिकार है जिसे अदालत ने मान्यता दी है।
इस महीने के अंत में अपनी सेवानिवृत्ति के मद्देनजर उच्च न्यायालय द्वारा आयोजित ‘पूर्ण अदालत विदाई समारोह’ में न्यायमूर्ति गुप्ता ने कहा कि उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान संविधान को बरकरार रखा है।
बार से 2009 में उच्च न्यायालय की अतिरिक्त न्यायाधीश के तौर पर प्रोन्नत हुईं न्यायमूर्ति गुप्ता ने कहा, “मेरे लिए, न्याय करना कोई दैवीय कर्तव्य निभाने जैसा नहीं था। राहत देते समय न्यायाधीश परोपकार नहीं करते हैं। यह वादी का अधिकार है जिसे न्यायालय मान्यता देता है।”
एक वकील के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान आपराधिक पक्ष पर दिल्ली सरकार के लिए एक स्थायी वकील रहीं, न्यायमूर्ति गुप्ता ने संसद और लालकिला गोलीबारी मामलों के साथ-साथ जेसिका लाल हत्याकांड, नैना साहनी हत्याकांड और नीतीश कटारा हत्याकांड में उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय में अभियोजन पक्ष का प्रतिनिधित्व किया।
न्यायमूर्ति गुप्ता प्रियदर्शनी मट्टू हत्याकांड मामले में केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) की तरफ से विशेष अधिवक्ता थीं।
अपने विदाई भाषण में, न्यायमूर्ति गुप्ता ने कहा कि उन्होंने हमेशा अधिकतम मामलों के निस्तारण का प्रयास किया। उन्होंने बताया कि अपने कार्यकाल के पिछले एक वर्ष में उन्होंने लगभग 300 हिरासत अपीलों का निस्तारण एक खंडपीठ का नेतृत्व करते हुए किया।
न्यायमूर्ति गुप्ता का जन्म 28 जून 1961 को हुआ था और उन्होंने 1983 में ‘कैंपस लॉ सेंटर’ से एलएलबी की थी।
उन्हें 23 अक्टूबर, 2009 को उच्च न्यायालय के अतिरिक्त न्यायाधीश के रूप में नियुक्त किया गया था। वह 29 मई, 2014 को स्थायी न्यायाधीश बनीं।
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