देश की खबरें | सदन में 10 प्रतिशत सदस्यों वाली पार्टी को विपक्षी नेता का दर्जा देना लंबी परंपरा : उप्र विधानपरिषद

नयी दिल्ली, एक मई उत्तर प्रदेश विधान परिषद ने सोमवार को उच्चतम न्यायालय में दलील दी कि सदन की कुल सदस्य संख्या के 10वें हिस्से के बराबर संख्या बल रखने वाले सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता को ‘विपक्षी नेता’ का दर्जा दिया जाना दशकों पुरानी परंपरा है और इस प्रक्रिया में न्यायालय से हस्तक्षेप नहीं करने का आग्रह किया।

उप्र विधानपरिषद अध्यक्ष की ओर से न्यायालय में पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता के. वी. विश्वनाथन ने प्रधान न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला की पीठ से कहा कि अदालत को विपक्षी नेता की नियुक्ति के लिए सदन द्वारा निर्धारित प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने से बचना चाहिए।

उन्होंने कहा, ‘‘कुछ अपवादों को छोड़ कर इस परंपरा का वर्षों से पालन किया जा रहा है। सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के नेता को विपक्षी नेता का दर्जा दिया जाता है, बशर्ते कि सदन की कुल सदस्य संख्या के 10वें हिस्से के बराबर उस पार्टी के सदस्यों की संख्या हो।

विधान परिषद ने समाजवादी पार्टी (सपा) के एमएलसी (विधानपरिषद सदस्य) लाल बिहारी यादव की एक याचिका पर दाखिल किये गये जवाब में यह दलील दी है। याचिका में, इलाहाबाद उच्च न्यायालय के उस आदेश को चुनौती दी गई है जिसमें विपक्ष के नेता के तौर पर उनकी मान्यता वापस लिये जाने के फैसले को बरकरार रखा गया था।

उल्लेखनीय है कि राज्य विधानमंडल के उच्च सदन (विधानपरिषद) के अध्यक्ष ने सात जुलाई 2022 को जारी एक अधिसूचना में यादव का विपक्षी नेता के तौर पर दर्जा वापस लेने की घोषणा की थी।

उप्र विधान परिषद के कुल सदस्यों की संख्या 100 है, जिनमें 90 निर्वाचित हैं और 10 मनोनीत सदस्य हैं।

यादव ने दलील दी थी सपा को विपक्षी नेता का पद मिलना चाहिए क्योंकि उसके नौ सदस्य हैं, जो 90 निर्वाचित सदस्यों का 10 प्रतिशत है।

याचिका के मुताबिक, यादव 2020 में विधानपरिषद सदस्य निर्वाचित हुए थे और 27 मई 2020 को उन्हें सदन में विपक्ष का नेता नामित किया गया था। लेकिन सदन में सपा सदस्यों की संख्या 10 से कम रहने को लेकर विधानपरिषद सचिवालय ने विपक्षी नेता के रूप में उन्हें अमान्य घोषित कर दिया।

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