ईरान: नए सर्वोच्च नेता मोजतबा खमेनेई ने जारी किया पहला संदेश

भारत और दुनिया की बड़ी खबरें एक साथ, एक ही जगह पढ़ने के लिए आप सही पेज पर हैं.

प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

भारत और दुनिया की बड़ी खबरें एक साथ, एक ही जगह पढ़ने के लिए आप सही पेज पर हैं. इस लाइव ब्लॉग को हम लगातार अपडेट कर रहे हैं, ताकि ताजा खबरें आप तक पहुंचा सकें.- भारत ने गुजरात आ रहे थाई जहाज पर ईरानी हमले की निंदा की

- जी-7 देशों का कड़ा फैसला, रूस पर जारी रहेंगे प्रतिबंध

- एयर न्यूजीलैंड ने महंगे ईंधन के चलते की उड़ानों में कटौती

- इराक के सभी तेल टर्मिनलों पर कामकाज ठप

- अमेरिका ने भारत और चीन समेत 16 व्यापारिक साझेदारों के खिलाफ जांच शुरू की

- अपने ऊपर हुए हमले पर फारूक अब्दुल्ला बोले, 'मुझे लगा कोई पटाखा चला है'

ईरान के नए सर्वोच्च नेता मोजतबा खमेनेई ने जारी किया पहला संदेश

ईरान का नया सर्वोच्च नेता नियुक्त होने के बाद मोजतबा खमेनेई का पहला आधिकारिक संदेश ईरानी सरकारी टीवी पर पढ़ा गया है. देश के इस सर्वोच्च पद पर अपनी नियुक्ति की घोषणा के बाद से मोजतबा सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आए हैं. टीवी एंकर द्वारा पढ़े गए इस संदेश में उन्होंने मौजूदा युद्ध और संकट के बीच ईरानी लोगों से एकजुटता बनाए रखने की अपील की है.

सीएनएन और द गार्डियन की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका और इस्राएल के बमबारी अभियान के पहले दिन मोजतबा खमेनेई के पैर में फ्रैक्चर हो गया था और उन्हें कुछ अन्य मामूली चोटें आई थीं. साइप्रस में ईरान के राजदूत अलीरेजा सलारियन ने बुधवार को पुष्टि की है कि मोजतबा उसी भीषण हवाई हमले में घायल हुए थे, जिसमें उनके पिता और पूर्व सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खमेनेई के साथ-साथ उनके परिवार के पांच अन्य सदस्यों की मौत हो गई थी.

अपने पहले संदेश में नए सर्वोच्च नेता ने दुश्मनों को बेहद कड़ी चेतावनी दी है. उन्होंने स्पष्ट किया है कि एक प्रमुख वैश्विक शिपिंग मार्ग, होर्मुज जलडमरूमध्य, दबाव के एक हथियार के रूप में आगे भी पूरी तरह से बंद रहेगा. इसके साथ ही संदेश में अमेरिका को सीधी धमकी देते हुए कहा गया है कि क्षेत्र में मौजूद सभी अमेरिकी ठिकानों को तुरंत बंद कर दिया जाना चाहिए, अन्यथा उन पर हमला किया जाएगा.

यह भी पढ़ें: युद्ध खत्म होने के बाद कैसा दिख सकता है ईरान का भविष्य

बांग्लादेश के डीजल आपूर्ति के अनुरोध पर विचार कर रहा भारत: विदेश मंत्रालय

भारत के विदेश मंत्रालय ने बताया है कि उन्हें बांग्लादेश से डीजल की आपूर्ति के लिए अनुरोध प्राप्त हुआ है. विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने प्रेस ब्रीफिंग में कहा कि बांग्लादेश को डीजल की आपूर्ति करने से पहले भारत डीजल की उपलब्धता और अपनी रिफाइनिंग क्षमता को ध्यान में रखेगा. उन्होंने यह भी बताया कि भारत से बांग्लादेश को डीजल का निर्यात 2017 से काफी हद तक जारी है.

जायसवाल ने यह भी जानकारी दी कि भारत को श्रीलंका और मालदीव्स आदि देशों से भीपेट्रोलियम उत्पादों की आपूर्ति के लिए अनुरोध प्राप्त हुए हैं, जिनपर विचार किया जा रहा है. उन्होंने कहा कि भारत अपने पड़ोसी देशों के लिए रिफाइंड पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स का प्रमुख निर्यातक है और मौजूदा समय में अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं और उपलब्धता को देखते हुए फैसला लिया जाएगा.

हॉर्मुज स्ट्रेट में ऑयल टैंकरों को एस्कॉर्ट करने के लिए तैयार नहीं अमेरिकी सेना

अमेरिका के ऊर्जा सचिव क्रिस राइट ने कहा है कि हॉर्मुज स्ट्रेट में तेल के टैंकरों को एस्कॉर्ट करने के लिए अमेरिकी सेना फिलहाल तैयार नहीं है. उन्होंने कहा कि यह इसलिए संभव नहीं है क्योंकि अभी सेना के सभी एसेट, ईरान पर हमले करने में व्यस्त हैं. तेल के टैंकरों को एस्कॉर्ट करने का मतलब यह होता कि अमेरिकी नौसैनिक जहाज उनके साथ चलते और उन्हें ईरान के संभावित हमलों से बचाते.

हालांकि, अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप इससे पहले तेल टैंकरों के लिए नेवी एस्कॉर्ट का प्रस्ताव दे चुके हैं. लेकिन अभी तक ऐसा नहीं हुआ है. क्रिस राइट ने सीएनबीसी से कहा, यह अपेक्षाकृत जल्द ही होगा, लेकिन अभी नहीं हो सकता. हम अभी तैयार नहीं हैं. उन्होंने आगे कहा कि इस बात की काफी संभावना है कि ऐसी एस्कॉर्ट सेवाएं इस महीने के अंत तक शुरू हो जाएंगी.

इस बीच खाड़ी देशों में मौजूदा ऊर्जा ठिकानों पर ईरान के हमले जारी हैं. अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी ने कहा है कि यह युद्ध "वैश्विक तेल बाजार के इतिहास में सबसे बड़ी आपूर्ति बाधा पैदा कर रहा है". इसका असर भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे एशियाई देशों पर भी हो रहा है, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा हॉर्मुज स्ट्रेट के माध्यम से आयात करते हैं.

रूस: मॉस्को कॉन्सर्ट हॉल हमले के 15 दोषियों को उम्रकैद की सजा

मॉस्को की एक अदालत ने गुरुवार को 2024 के 'क्रोकस सिटी हॉल' नरसंहार के मामले में 15 लोगों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है. इस आतंकी हमले में 150 लोगों की जान चली गई थी और यह पिछले दो दशकों में रूस में हुआ सबसे घातक आतंकी हमला था. इस जानलेवा हमले के बाद आतंकवादी संगठन इस्लामिक स्टेट ने इसकी जिम्मेदारी ली थी.

यह भी पढ़ें: रूसी युद्ध के खिलाफ यूक्रेनी हौसला पांचवें साल में भी बरकरार

उम्रकैद की सजा पाने वालों में वे चार मुख्य बंदूकधारी भी शामिल हैं, जिन्होंने कॉन्सर्ट में भीड़ पर अंधाधुंध गोलियां चलाईं और फिर पूरी इमारत में आग लगा दी थी. ये चारों मुख्य हमलावर ताजिकिस्तान के नागरिक हैं. इनके अलावा, आतंकवादी गतिविधियों में सहयोग करने वाले 11 अन्य लोगों को भी आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई है, जिनमें कुछ रूसी नागरिक भी शामिल हैं.

मार्च 2024 में पिकनिक रॉक बैंड के प्रदर्शन से ठीक पहले हुआ यह हमला 2004 के 'बेसलान स्कूल' की घेराबंदी के बाद देश का सबसे बड़ा आतंकी हमला था. इस हमले में 600 से अधिक लोग बुरी तरह घायल हुए थे और 6 बच्चों को भी अपनी जान गंवानी पड़ी थी.

यह हमला ऐसे समय में हुआ था जब रूस के यूक्रेन पर आक्रमण को दो साल पूरे हो चुके थे. रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और अन्य अधिकारियों ने बिना कोई सबूत पेश किए इस हमले में यूक्रेन की भूमिका होने का दावा किया था, जबकि कीव ने किसी भी तरह की संलिप्तता से साफ इनकार किया था.

यह भी पढ़ें: भारत ने रूस से तेल खरीदना बंद किया तो क्या नुकसान होगा?

चीन ने पारित किया विवादित 'जातीय एकता' कानून

चीन की नेशनल पीपुल्स कांग्रेस ने आधिकारिक तौर पर उस कानून को मंजूरी दे दी है जिसे वह 'जातीय एकता' कानून कहता है. मानवाधिकार समूहों ने इस कदम की कड़ी आलोचना करते हुए चेतावनी दी है कि यह कानून अल्पसंख्यक समूहों को समाज में और अधिक हाशिए पर ढकेल देगा. यह नया कानून शिक्षा और सार्वजनिक मामलों जैसे आधिकारिक कार्यों के लिए मैंडरिन को राष्ट्रीय सामान्य भाषा के रूप में बढ़ावा देने की नीतियों को औपचारिक रूप देता है.

यह भी पढ़ें: चीन के शीर्ष सैन्य जनरलों से डगमगा रहा शी जिनपिंग का भरोसा

इस कानून के लागू होने के बाद, सभी शैक्षणिक संस्थानों के लिए मैंडरिन में पढ़ाना अनिवार्य हो जाएगा. इसके साथ ही, अनिवार्य शिक्षा पूरी करने वाले किशोरों के लिए इस भाषा की बुनियादी समझ होना भी आवश्यक कर दिया गया है. चीनी सरकार पर पिछले कई दशकों से यह आरोप लगता रहा है कि वह अपनी विशाल आबादी में मौजूद अल्पसंख्यकों को जबरन 'हान' बहुसंख्यक वर्ग में मिलाने की कोशिश कर रही है. चीन अपने क्षेत्र के भीतर 55 आधिकारिक जातीय अल्पसंख्यकों को मान्यता देता है, जो सैकड़ों भाषाएं और बोलियां बोलते हैं.

इस कानून का एक बेहद विवादास्पद पहलू इसका अंतरराष्ट्रीय दायरा है. इसमें स्पष्ट किया गया है कि यह कानून चीन की सीमाओं के बाहर भी लागू किया जा सकता है. इसका मतलब है कि चीन के बाहर रहने वाले जो लोग जातीय एकता को कमजोर करने वाली गतिविधियों में शामिल होते हैं या जातीय अलगाववाद को भड़काते हैं, उन्हें भी कानूनी रूप से जिम्मेदार ठहराया जा सकता है. हालांकि, नए कानून में किसी विशेष अल्पसंख्यक भाषा का नाम नहीं लिया गया है, लेकिन इसका सीधा और सबसे गहरा असर उइगर, मंगोलियाई और तिब्बती बोलने वालों पर पड़ने की आशंका है.

यह भी पढ़ें: अमेरिका पीछे, चीन आगे? कैसे बदल रही है वैश्विक व्यवस्था

पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी बोले, यह अफवाहें फैलाने का समय नहीं

केंद्रीय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने गुरुवार को लोकसभा में एलपीजी की कमी को लेकर बयान दिया. उन्होंने कहा कि पिछले पांच दिनों में एलपीजी उत्पादन को 28 फीसदी बढ़ाया गया है और मोदी सरकार की सबसे बड़ी प्राथमिकता है कि देश के 33 करोड़ परिवारों की रसोई में गैस की कमी न हो. उन्होंने कहा कि घरेलू आपूर्ति पूरी तरह से सुरक्षित है और घरों तक सिलेंडर पहुंचने में लगने वाले समय में कोई बदलाव नहीं आया है.

उन्होंने यह भी कहा कि भारत इतिहास में दर्ज सबसे गंभीर वैश्विक ऊर्जा संकट का सामना कर रहा है और यह अफवाहें या झूठे नैरेटिव फैलाने का समय नहीं है. उन्होंने बताया कि वैकल्पिक आपूर्ति मार्गों से लगभग हर दिन बड़ी मात्रा में एलएनजी कार्गो आ रहे हैं. उन्होंने जानकारी दी कि ये कार्गो अमेरिका, नॉर्वे, कनाडा, अल्जीरिया और रूस आदि से आ रहे हैं. उन्होंने यह भी भरोसा दिलाया कि देश में पेट्रोल, डीजल, केरोसिन, एयर टर्बाइन फ्यूल या फ्यूल ऑइल की कोई कमी नहीं है.

राहुल गांधी ने मोदी सरकार की विदेश नीति को बताया “कमजोर और दिशाहीन”

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के चलते पैदा हुए ऊर्जा आपूर्ति के संकट पर टिप्पणी की है. उन्होंने अपने एक्स अकाउंट पर लिखा, “संकट हमारे दरवाजे पर है. अगर सरकार ने तुरंत कदम नहीं उठाए, तो एलपीजी, पेट्रोल और डीजल करोड़ों भारतीय परिवारों के लिए बड़ी समस्या बन जाएंगे.” उन्होंने आगे लिखा, “कमजोर और दिशाहीन विदेश नीति ने देश को इस खतरनाक स्थिति में ला खड़ा किया है.”

राहुल गांधी ने संसद में भी इस बारे में टिप्पणी की. उन्होंने कहा कि हॉर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने के चलते भारत के ऊपर काफी असर होगा क्योंकि हमारे तेल और प्राकृतिक गैस का एक बड़ा हिस्सा उस रास्ते से आता है. उन्होंने कहा कि रेस्तरां बंद हो रहे हैं और एलपीजी की आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ रही है. राहुल ने इसे संकट की शुरुआत भर बताया.

उन्होंने मोदी सरकार की विदेश नीति की आलोचना करते हुए कहा कि अमेरिका को यह तय करने की अनुमति क्यों दी जा रही है कि हम किससे तेल और गैस खरीदेंगे या हम रूस से तेल खरीद सकते हैं या नहीं. राहुल ने अपने भाषण में पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी को भी घेरा. राहुल ने दावा किया कि हरदीप सिंह पुरी खुद कह चुके हैं कि वे जेफ्री एप्स्टीन के दोस्त हैं.

एस जयशंकर ने जहाजों की सुरक्षा को लेकर ईरानी विदेश मंत्री से बात की

भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने गुरुवार, 12 मार्च को एक प्रेस ब्रीफिंग में बताया कि भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर ने हालिया दिनों में तीन बार ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची से फोन पर बातचीत की है. जायसवाल ने कहा, “पिछली बातचीत में शिपिंग की सुरक्षा और भारत की ऊर्जा सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर बातचीत हुई. इसके अलावा, कुछ भी कहना मेरे लिए जल्दबाजी होगी.”

जायसवाल ने यह भी कहा कि वे भारतीय नागरिकों की निकासी को लेकर फिक्रमंद हैं और उन्हें हर तरह की सहूलियत पहुंचाने की कोशिश जारी है. उन्होंने कहा कि जो भारतीय अजरबाइजान और आर्मेनिया के रास्ते वापस भारत आना चाहते हैं, उन्हें वीजा दिलाने और जमीन के रास्ते सीमा पार कराने में भी सहायता दी जा रही है.

उन्होंने बताया, "ईरान में करीब 9,000 भारतीय नागरिक मौजूद थे या अभी भी हैं. इनमें स्टूडेंट, नाविक, कारोबारी, पेशेवर लोग और कुछ तीर्थयात्री शामिल हैं. बहुत सारे भारतीय नागरिक, जिनमें ज्यादातर स्टूडेंट थे, ईरान से निकलकर घर आ चुके हैं." उन्होंने बताया कि तेहरान में रहने वाले बहुत सारे भारतीय स्टूडेंट्स और तीर्थयात्रियों को अन्य सुरक्षित जगहों या शहरों में शिफ्ट किया गया है.

नॉर्वे पहुंचे जर्मन चांसलर फ्रीडरिष मैर्त्स; अंतरिक्ष, हथियार और ऊर्जा पर होगी बातचीत

जर्मन चांसलर फ्रीडरिष मैर्त्स गुरुवार को उत्तरी नॉर्वे की यात्रा पर जा रहे हैं. इस यात्रा के दौरान शाम को उनकी नॉर्वे के प्रधानमंत्री योनास गार स्तोर के साथ उच्च स्तरीय वार्ता होने वाली है. शुक्रवार को दोनों नेता एन्डेंस स्थित 'एन्डोया स्पेस पोर्ट' का दौरा करेंगे, जो जर्मन और यूरोपीय अंतरिक्ष अभियानों के लिए महत्वपूर्ण तकनीकी और ढांचागत सुविधाएं प्रदान करता रहा है.

यह भी पढ़ें: जर्मनी में आर्थिक दबाव के बीच राजनीतिक ध्रुवीकरण गहराया

अंतरिक्ष पोर्ट के दौरे के बाद, मैर्त्स और स्टोर कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी के साथ मिलकर बार्डुफॉस सैन्य अड्डे पर 'कोल्ड रिस्पॉन्स' सैन्य अभ्यास का संयुक्त रूप से निरीक्षण करेंगे. इस विशाल सैन्य अभ्यास में नॉर्वे और फिनलैंड में जर्मन सशस्त्र बलों के लगभग 1,600 सदस्य हिस्सा ले रहे हैं. इनके साथ ही अमेरिका सहित 13 अन्य नाटो देशों के हजारों सैनिक भी इस ड्रिल में शामिल हैं, जो 9 मार्च से शुरू होकर 19 मार्च तक चलेगी.

चांसलर मैर्त्स की इस यात्रा का मुख्य फोकस अंतरिक्ष और हथियारों के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने के साथ-साथ ऊर्जा आपूर्ति को सुरक्षित करने पर भी रहेगा.आंकड़ों के अनुसार, नॉर्वे अकेले जर्मनी के प्राकृतिक गैस आयात का लगभग 48 फीसदी और तेल आयात का 9 फीसदी हिस्सा पूरा करता है, जबकि पिछले साल जर्मनी ने मध्य पूर्व से अपनी जरूरत का केवल 6.1 फीसदी कच्चा तेल ही आयात किया था.

यह भी पढ़ें: अधिकांश जर्मन मतदाता ईरान युद्ध के खिलाफ; डर का माहौल

वैश्विक राजनीति में महिलाओं की हिस्सेदारी अभी भी कम: यूएन रिपोर्ट

इंटर-पार्लियामेंट्री यूनियन (आईपीयू) और संयुक्त राष्ट्र महिला (यूएन विमेन) द्वारा जारी नए आंकड़ों के अनुसार, दुनिया भर में राजनीतिक सत्ता के मामले में महिलाएं अभी भी समानता से काफी दूर हैं. रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि वर्तमान में केवल 28 देशों का नेतृत्व महिलाओं के हाथों में है, जबकि 101 देशों में आज तक कोई भी महिला राष्ट्राध्यक्ष या शासनाध्यक्ष नहीं बनी है. न्यूयॉर्क में 'कमीशन ऑन द स्टेटस ऑफ विमेन' के 70वें सत्र के दौरान 11 मार्च 2026 को प्रकाशित ये आंकड़े महिलाओं के राजनीतिक नेतृत्व में ठहराव और कुछ क्षेत्रों में गिरावट को स्पष्ट रूप से रेखांकित करते हैं.

यह भी पढ़ें: ब्रेकअप से उबरना है, तो एक्स का सोशल मीडिया अकाउंट देखना बंद करें

इन वैश्विक आंकड़ों के अनुसार, वर्तमान में महिलाओं के पास 22.4 प्रतिशत कैबिनेट पद और 27.5 प्रतिशत संसदीय सीटें हैं. हालांकि, संसदों में महिलाओं की हिस्सेदारी में मामूली वृद्धि दर्ज की गई है (जो 2025 में 27.2 प्रतिशत थी), लेकिन कैबिनेट में महिलाओं का अनुपात 2024 के 23.3 प्रतिशत से नीचे गिर गया है. संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में 9 से 19 मार्च 2026 तक चलने वाले लैंगिक समानता और महिला अधिकारों के इस वार्षिक सम्मेलन में प्रस्तुत किए गए ये आंकड़े बताते हैं कि इस दिशा में वर्षों से हो रही क्रमिक प्रगति अब पीछे की ओर खिसक रही है.

रिपोर्ट में महिलाओं के संसदीय नेतृत्व में भी चिंताजनक गिरावट का जिक्र किया गया है. जनवरी 2026 तक, दुनिया भर में 54 महिलाएं संसदों की अध्यक्ष के रूप में कार्यरत थीं, जो कुल अध्यक्षों का केवल 19.9 प्रतिशत है. यह पिछले वर्ष की तुलना में लगभग चार प्रतिशत अंकों की भारी गिरावट को दर्शाता है. सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि पिछले 21 वर्षों के इतिहास में यह पहली बार है जब महिला स्पीकरों की संख्या में इस तरह की गिरावट दर्ज की गई है.

यह भी पढ़ें: जापान की प्रधानमंत्री को क्यों करनी पड़ी संसद में टॉयलेट की मांग

दुनिया की एक तिहाई आबादी 'भीषण गर्मी' की चपेट में: स्टडी

'द नेचर कंजरवेंसी' संस्था के वैज्ञानिकों के नेतृत्व में किए गए एक नए अध्ययन के अनुसार, जलवायु परिवर्तन के कारण अब दुनिया की एक तिहाई आबादी ऐसे क्षेत्रों में रहने को मजबूर है, जहां भीषण गर्मी ने उनकी दैनिक गतिविधियों को बुरी तरह सीमित कर दिया है. मंगलवार को 'एनवायर्नमेंटल रिसर्च: हेल्थ' पत्रिका में प्रकाशित यह स्टडी वैश्विक गर्मी के जोखिमों पर पिछले शोधों से एक कदम आगे बढ़कर गर्मी के अनुकूल होने की सामाजिक और शारीरिक क्षमता का गहराई से विश्लेषण करती है.

यह भी पढ़ें: लोगों को भीषण गर्मी से बचाने के लिए ‘हीट ऑफिसर’ की नियुक्ति

रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि जीवाश्म ईंधन के लगातार जलने से बढ़ रहे तापमान के कारण अब युवा और स्वस्थ वयस्कों के लिए भी गर्मियों के चरम पर दिन के समय घर का काम करने या सीढ़ियां चढ़ने जैसी बुनियादी शारीरिक गतिविधियां करना मुश्किल हो रहा है. अध्ययन में पाया गया है कि 65 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों को अब हर साल औसतन 900 घंटे ऐसी भीषण गर्मी का सामना करना पड़ता है, जो सुरक्षित बाहरी गतिविधियों को गंभीर रूप से प्रतिबंधित करती है. 1950 में यह आंकड़ा 600 घंटे था.

इस जलवायु संकट का सबसे बुरा असर उन गरीब देशों या क्षेत्रों के लोगों पर पड़ रहा है, जो गैस, तेल और कोयले को जलाने वाले अमीर उपभोक्ताओं की तुलना में ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के लिए बहुत कम जिम्मेदार हैं. दक्षिण-पश्चिम एशिया (जैसे बहरीन, कतर, यूएई), दक्षिण एशिया (पाकिस्तान, बांग्लादेश, भारत) और पश्चिम अफ्रीका के कुछ हिस्सों में यह चुनौती सबसे गंभीर है.

यह भी पढ़ें: क्या है 35 सेल्सियस वेट बल्ब टेम्परेचर, जिसमें जान जा सकती है

ईरान युद्ध के चलते गैस ही नहीं, पानी भी हो सकता है महंगा

पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के चलते भारत में बोतलबंद पानी महंगा हो सकता है. दरअसल, कच्चे माल की आपूर्ति में आ रही बाधाओं के चलते, अब पानी की बोतल बनाना महंगा हो गया है. बोतलबंद पानी बेचने वाली कंपनियों के एक संघ के मुताबिक, प्लास्टिक की बोतल और ढक्कन से लेकर लेबल और कार्डबोर्ड के डिब्बे तक महंगे हो गए हैं.

तेल की कीमतें बढ़ने के चलते पॉलीमर की कीमतें भी बढ़ गई हैं, जो क्रूड ऑयल से बनता है और प्लास्टिक की बोलतें बनाने के लिए इस्तेमाल होता है. प्लास्टिक बोतलें बनाने में इस्तेमाल होने वाले सामान की कीमत में करीब 50 फीसदी की बढ़ोतरी हो चुकी है. वहीं, बोतलों के ढक्कनों की कीमत दोगुनी हो गई है.

न्यूज एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक, बड़ी कंपनियां अभी इन बढ़ी हुई कीमतों के नुकसान को खुद झेल रही हैं, इसलिए उपभोक्ताओं पर इसका असर नहीं पड़ रहा है. हालांकि, अगर यह महंगाई कुछ दिन और जारी रही तो उपभोक्ताओं को भी पानी की बोलतों के लिए अधिक कीमत चुकानी पड़ सकती है.

भारत में बोतलबंद पानी का बाजार करीब पांच अरब डॉलर का है. घरेलू बिस्लेरी, रिलायंस और टाटा से लेकर कोका-कोला और पेप्सी जैसी वैश्विक कंपनियां भी इस बाजार में मौजूद हैं. रिलायंस इस बाजार में नया है और उसने अपनी कीमतों को कम रखकर पुरानी कंपनियों को टक्कर देने की कोशिश की है.

लंदन, सैन फ्रांसिस्को और बीजिंग में वायु प्रदूषण में भारी कमी

एक नए विश्लेषण के अनुसार, लंदन, सैन फ्रांसिस्को और बीजिंग दुनिया के उन 19 शहरों में शामिल हैं, जिन्होंने वायु प्रदूषण में उल्लेखनीय कमी हासिल की है. इन शहरों ने 2010 के बाद से श्वसन तंत्र को नुकसान पहुंचाने वाले दो प्रमुख प्रदूषकों के स्तर में 20 फीसदी से अधिक की कटौती की है. दुनिया भर के लगभग 100 शहरों के इस विश्लेषण के अनुसार, इन 19 शहरों की सूची में चीन और हांगकांग के 9 शहर शामिल हैं, जबकि बाकी यूरोपीय शहर हैं.

यह भी पढ़ें: सड़क से ऊपर बालकनी में ज्यादा जहरीली हवा का खतरा

फाइन पार्टिकुलेट पॉल्यूशन (पीएम 2.5) को साफ करने के मामले में बीजिंग और वारसॉ ने रैंकिंग में शीर्ष स्थान हासिल किया है, जहां इसके स्तर में 45 फीसदी से अधिक की कमी दर्ज की गई है. वहीं, एम्स्टर्डम और रॉटरडैम ने नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (एनओ2) के स्तर में 40 फीसदी से अधिक की कटौती के साथ सबसे बड़ा सुधार दिखाया है. रिपोर्ट के मुताबिक, सैन फ्रांसिस्को अमेरिका का इकलौता ऐसा शहर रहा जिसने इन दोनों खतरनाक प्रदूषकों के स्तर को 20 फीसदी से अधिक कम करने में सफलता पाई है.

ब्रिटिश अखबार 'द गार्डियन' के साथ विशेष रूप से साझा की गई इस रिपोर्ट में सी40 और'ब्रीद सिटीज' नेटवर्क के शहरों की वायु गुणवत्ता का अध्ययन किया गया. इनमें ज्यादातर बड़े शहर शामिल थे, लेकिन जर्मनी के हाइडलबर्ग जैसे कुछ छोटे शहर भी इसका हिस्सा थे. विश्लेषण में पाया गया कि साइकिल लेन के निर्माण, इलेक्ट्रिक कारों के बढ़ते उपयोग और प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों पर सख्त प्रतिबंध लगाने जैसे सुनियोजित प्रयासों के परिणामस्वरूप ही 15 वर्षों के भीतर प्रदूषण में यह पर्याप्त कमी हासिल की जा सकी है.

यह भी पढ़ें: प्रदूषित दिल्ली में साफ हवा देने की कोशिश करते 'ग्रीन' कैफे

फीफा विश्व कप 2026 का बहिष्कार कर सकता है ईरान

ईरान के खेल मंत्री अहमद दोन्यामाली ने बुधवार को बताया कि अमेरिका और इस्राएल के हवाई हमलों के कारण उनका देश 2026 के फीफा विश्व कप में हिस्सा नहीं लेगा. इस बार के विश्व कप की सह-मेजबानी अमेरिका कर रहा है. मंत्री ने सरकारी टेलीविजन पर बताया कि उनके नेता की हत्या के बाद ऐसी कोई परिस्थिति नहीं बची है जिसमें वे इस टूर्नामेंट में भाग ले सकें. खिलाड़ियों की सुरक्षा पर गंभीर चिंता जताते हुए उन्होंने कहा, "हमारे बच्चे सुरक्षित नहीं हैं."

यह भी पढ़ें: 2026 का फुटबॉल वर्ल्ड कप फैंस के लिए बनेगा मुसीबत

हालांकि, यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं है कि बहिष्कार का यह निर्णय अंतिम है या नहीं, लेकिन ईरानी फुटबॉल महासंघ के अध्यक्ष मेहदी ताज ने भी इसकी संभावना जताई है. उन्होंने ऑस्ट्रेलिया में हुए महिला एशिया कप का उदाहरण दिया, जहां राष्ट्रगान न गाने पर पांच ईरानी महिला खिलाड़ियों को स्वदेश लौटने पर संभावित उत्पीड़न के डर से ऑस्ट्रेलिया में शरण दी गई थी. ताज ने कहा कि अगर विश्व कप भी ऑस्ट्रेलिया टूर्नामेंट की तरह ही राजनीतिक होने वाला है, तो कोई भी समझदार व्यक्ति अपनी राष्ट्रीय टीम को अमेरिका नहीं भेजेगा.

इस पूरे विवाद के बीच, फीफा अध्यक्ष जियानी इन्फेंटिनो ने बताया है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने मंगलवार को एक बैठक में उनसे कहा था कि युद्ध के बावजूद टूर्नामेंट में प्रतिस्पर्धा के लिए ईरानी टीम का स्वागत है. हालांकि, इससे पहले डॉनल्ड ट्रंप यह टिप्पणी भी कर चुके हैं कि उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि ईरान विश्व कप में भाग लेता है या नहीं. बता दें कि ईरान उन 48 देशों में शामिल है, जिन्होंने अमेरिका, मैक्सिको और कनाडा द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित किए जा रहे इस विश्व कप के लिए क्वालीफाई किया है.

यह भी पढ़ें: वो शहजादी जिसने बदल दी सऊदी अरब में खेलों की दुनिया

वजन घटाने वाली दवाइयों के विज्ञापनों को लेकर भारत ने दी चेतावनी

भारत के दवा नियामक ने दवा कंपनियों को चेतावनी दी है कि वे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से वजन घटाने वाली दवाइयों के विज्ञापन जारी न करें. केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन ने दवा कंपनियों द्वारा मोटापे के प्रति जागरुकता अभियान चलाए जाने पर भी सख्ती दिखाई है और कहा है कि ये सेरोगेट प्रमोशन की तरह काम कर सकते हैं.

संगठन ने अपनी एडवाइजरी में कहा है कि कोई भी विज्ञापन जो दवाइयों के प्रभाव को बढ़ा-चढ़ाकर बताता है, वजन घटाने की गारंटी देता है, या जीवनशैली में बदलाव को कम करके आंकता है, उसे भ्रामक विज्ञापन माना जाएगा और उसके खिलाफ कार्रवाई हो सकेगी. भारत के मौजूदा दवा नियम कहते हैं कि ऐसी दवाएं जो सिर्फ डॉक्टर के पर्चे के आधार पर मिलती हैं, उनका विज्ञापन नहीं दिया जा सकता.

यह एडवाइजरी ऐसे समय पर आयी है, जब एली लिली और नोवो नॉर्डिस्क जैसी वैश्विक कंपनियां भारत में अपनी पहुंच बढ़ाने के लिए बड़े स्तर पर प्रचार अभियान चला रही हैं. लिली ने अपने सोशल मीडिया अभियान में बॉलीवुड के कई एक्टरों को शामिल किया है, जिसमें वे मोटापे के प्रति जागरुकता फैलाते हैं. इसके अलावा, ये कंपनियां डिजिटल प्लेटफॉर्मों और सार्वजनिक स्थानों पर भी अपने विज्ञापन लगा रही हैं.

Share Now

\