8th Pay Commission: क्या केंद्रीय कर्मचारियों को NPS की जगह फिर मिलेगा ओल्ड पेंशन स्कीम का लाभ? जानें क्या हैं नियम और चुनौतियां
प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credits: File Image)

नई दिल्ली, 6 जून: भारत में सरकारी कर्मचारियों की पेंशन व्यवस्था में सुधार को लेकर जारी बहस ने एक बार फिर गति पकड़ ली है. कर्मचारी संगठनों और यूनियनों ने केंद्र सरकार से आगामी 8वें केंद्रीय वेतन आयोग (8th Central Pay Commission) के तहत राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली (NPS) को समाप्त कर पुरानी पेंशन योजना (OPS) को पूरी तरह बहाल करने की अपनी पुरानी मांग को नए सिरे से दोहराया है. हालांकि, इस आंदोलन के बीच स्वयं यूनियन नेताओं ने भी अनौपचारिक रूप से यह स्वीकार किया है कि मौजूदा आर्थिक परिस्थितियों में पूरी तरह से पुरानी व्यवस्था (OPS) पर लौटना प्रशासनिक रूप से कठिन हो सकता है. इसके बावजूद, 8वें वेतन आयोग की सिफारिशों से पहले यह मुद्दा देश के लाखों कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के लिए कौतूहल का विषय बना हुआ है. यह भी पढ़ें: 8th Pay Commission: 8वें वेतन आयोग का बड़ा फैसला; ज्ञापन सौंपने की तारीख 15 जून तक बढ़ी, जानें विलंब से आपकी सैलरी, एरियर और HRA पर क्या होगा असर

क्या है ओल्ड पेंशन स्कीम (OPS) और इसकी विशेषताएं?

पुरानी पेंशन योजना (OPS) मूल रूप से सरकार द्वारा वित्त पोषित एक ऐसी सेवानिवृत्ति प्रणाली है, जो सेवानिवृत्त कर्मचारियों को जीवन भर के लिए एक निश्चित और गारंटीकृत मासिक पेंशन का अधिकार देती है. इस व्यवस्था के तहत, सेवानिवृत्ति के समय पेंशनर को उसके अंतिम आहरित मूल वेतन (Last Drawn Basic Salary) का लगभग 50 प्रतिशत हिस्सा मासिक पेंशन के रूप में मिलना तय होता है.

इसके अतिरिक्त, समय-समय पर घोषित होने वाले महंगाई भत्ते (Dearness Allowance - DA) के संशोधनों को भी इस पेंशन में जोड़ा जाता है, जिससे कर्मचारियों को बढ़ती मुद्रास्फीति और महंगाई के प्रभाव से निपटने में मदद मिलती है. ओपीएस के समर्थकों का सबसे मजबूत तर्क यही है कि यह प्रणाली बाजार के उतार-चढ़ाव से पूरी तरह मुक्त है और सेवानिवृत्त नागरिकों को एक सुरक्षित व अनुमानित आय की गारंटी प्रदान करती है.

कर्मचारी संगठन क्यों कर रहे हैं पुरानी व्यवस्था की मांग?

'ऑल इंडिया एनपीएस एम्प्लॉइज फेडरेशन' (AINPSEF) सहित देश के कई बड़े कर्मचारी संघों का कहना है कि वर्तमान राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली (NPS) पूरी तरह से मार्केट-लिंक्ड (बाजार के रिटर्न पर आधारित) है, जिसके कारण इसमें मिलने वाले लाभ पूरी तरह अनिश्चित और अस्थिर होते हैं.

यूनियन प्रतिनिधियों ने कुछ चौंकाने वाले दावे करते हुए कहा है कि एनपीएस के तहत सेवानिवृत्त हुए कई कर्मचारियों—विशेष रूप से वे जो अपने करियर के उत्तरार्ध या अंतिम वर्षों में सरकारी सेवा में शामिल हुए थे—को हर महीने मात्र ₹200 से ₹2,000 तक की बेहद मामूली पेंशन मिल रही है. कर्मचारियों का मानना है कि बुढ़ापे की सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा के लिए ओपीएस ही एकमात्र व्यावहारिक और भरोसेमंद विकल्प है.

एनपीएस को पूरी तरह हटाना क्यों है एक बड़ी चुनौती?

आर्थिक और वित्तीय मामलों के विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि एनपीएस को पूरी तरह से रोलबैक (निरस्त) करना सरकार के लिए वित्तीय और संरचनात्मक रूप से बेहद पेचीदा है. अपनी शुरुआत से लेकर अब तक, एनपीएस के तहत कुल संचित योगदान (Contributions) का आकार ₹16.5 लाख करोड़ से भी अधिक का हो चुका है.

इस विशाल धनराशि को देश के बड़े वित्तीय संस्थानों, जैसे एलआईसी (LIC), एसबीआई (SBI), यूटीआई (UTI) और अन्य मान्यता प्राप्त फंड प्रबंधकों के माध्यम से भारतीय वित्तीय बाजारों और प्रतिभूतियों में निवेश किया गया है. ऐसे में एनपीएस को अचानक बंद करने से वित्तीय बाजारों में भारी उथल-पुथल मच सकती है, तरलता (Liquidity) प्रभावित हो सकती है और देश के सामने एक बड़ा राजकोषीय (Fiscal Burden) व प्रशासनिक संकट खड़ा हो सकता है. यह भी पढ़ें: 8th Pay Commission: केंद्रीय कर्मचारियों और पेंशनभोगी संगठनों के लिए बड़ी खबर, वेतन-पेंशन सिफारिशों के लिए बढ़ी अंतिम तारीख

8वें वेतन आयोग की प्रगति और भावी उम्मीदें

पेंशन सुधारों को लेकर जारी यह खींचतान एक ऐसे समय में निर्णायक मोड़ पर है जब 8वां केंद्रीय वेतन आयोग अपनी समीक्षा प्रक्रिया को निरंतर आगे बढ़ा रहा है. सुप्रीम कोर्ट की पूर्व न्यायाधीश रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता में गठित इस आयोग की स्थापना नवंबर 2025 में की गई थी, और यह समिति पिछले छह महीनों से अधिक समय से विभिन्न पक्षों के साथ विचार-विमर्श कर रही है.

इस आयोग की अंतिम सिफारिशों का सीधा असर देश के लगभग 50 लाख केंद्रीय सरकारी कर्मचारियों (जिनमें रक्षा कर्मी भी शामिल हैं) और करीब 65 लाख से अधिक पेंशनभोगियों के वेतन, भत्तों और भविष्य की सामाजिक सुरक्षा पर पड़ने वाला है. यही कारण है कि आगामी महीनों में आने वाली आयोग की अंतिम रिपोर्ट से पहले, पेंशन सुरक्षा का यह नीतिगत मुद्दा देश के सबसे संवेदनशील और बारीकी से नजर रखे जाने वाले विषयों में से एक बना हुआ है.