देश की खबरें | यमुना नदी के पुनरुद्धार कार्य में हस्तक्षेप उचित नहीं : दिल्ली उच्च न्यायालय

नयी दिल्ली, तीन मार्च दिल्ली उच्च न्यायालय ने नदी तल से नर्सरी हटाने की डीडीए की कार्रवाई के खिलाफ दायर याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि यमुना नदी की स्थिति उस सीमा को पार कर गई है, जहां इसके पुनरुद्धार प्रयासों में किसी भी तरह के हस्तक्षेप को उचित नहीं ठहराया जा सकता।

उच्च न्यायालय ने कहा कि उसे यह मानने में कोई हिचकिचाहट नहीं है कि याचिकाकर्ता नर्सरियां अतिक्रमणकारी हैं, जिन्हें किसी भी उद्देश्य के लिए भूमि का इस्तेमाल करने, कब्जा जारी रखने या वैकल्पिक आवंटन का अनुरोध करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है।

उसने कहा कि मामले में किसी भी तरह का दखल केवल दिल्ली के हरित क्षेत्र को सुरक्षित रखने के लिए विकसित की जा रही सार्वजनिक परियोजनाओं में बाधा डालेगा और इन्हें तय समय में कार्यान्वित होने से रोकेगा।

उच्च न्यायालय ने कहा, “यमुना नदी की मौजूदा स्थिति उस सीमा को पार कर गई है, जहां इसके पुनरुद्धार से जुड़े प्रयासों में किसी भी तरह के हस्तक्षेप-चाहे वह मानवीय या सहानुभूतिपूर्ण कारणों की आड़ में हो-को जायज नहीं ठहराया जा सकता।”

न्यायमूर्ति धर्मेश शर्मा ने हाल ही में पारित आदेश में कहा, “इस तरह का कोई भी हस्तक्षेप केवल सार्वजनिक परियोजनाओं में बाधा डालेगा और इन्हें तय समय में कार्यान्वित होने से रोकेगा।”

उच्च न्यायालय ने यह टिप्पणी दिल्ली मास्टर प्लान-2021 के जोन ‘ओ’ यानी यमुना डूब क्षेत्र में आने वाले यमुना खादर में सक्रिय एक नर्सरी कल्याण संगठन की याचिका को खारिज करते हुए की।

याचिका में संगठन ने दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) द्वारा उनकी नर्सरियों को हटाने और बुलडोजर से सभी पौधों को नष्ट करने की कार्रवाई का विरोध किया था।

उसने दावा किया था कि डीडीए ने संगठन के सदस्यों को सुनवाई का मौका दिए बिना और राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) के 2019 के निर्देशों के अनुसार भूमि का भौतिक सीमांकन किए बिना ही ध्वस्तीकरण अभियान चलाया।

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