प्रयागराज, एक जून इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक अपर महाधिवक्ता की ओर से एक ही मुकदमे में दो बिल बनाकर भुगतान लेने के मामले को गंभीरता से लेते हुए कहा है कि करदाताओं के पैसे का दुरुपयोग नहीं किया जा सकता।
अदालत ने अपर महाधिवक्ता से अतिरिक्त बिल की रकम वसूलने का निर्देश दिया। अपर महाधिवक्ता ने एक ही मुकदमे में एक बिल विकास प्राधिकरण के नाम बनाया और दूसरा बिल राज्य सरकार के नाम बनाकर भुगतान प्राप्त किया।
ईशान इंटरनेशनल एजुकेशनल सोसाइटी नाम की संस्था द्वारा दायर एक अवमानना याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति रोहित रंजन अग्रवाल ने कहा, ‘‘मौजूदा मामले में यदि एक वकील द्वारा दो बिल बनाया जाता है.. एक बिल राज्य की ओर से और दूसरा बिल विकास प्राधिकरण की ओर से तो इससे उसका गलत आचरण दिखता है।’’
अदालत ने पूछा कि अपर महाधिवक्ता के तौर पर राज्य का प्रतिनिधित्व कर रहा एक वकील कैसे दो बिल बना सकता है। अधिवक्ता ने दूसरा बिल गाजियाबाद विकास प्राधिकरण की ओर से बनाया था।
इन निर्देशों को पारित करते हुए अदालत ने राज्य के मुख्य सचिव को इलाहाबाद उच्च न्यायालय में राज्य के विधि विभाग की कार्य प्रणाली से अदालत को अवगत कराने और इस मामले पर उचित कार्रवाई के लिए इसे कैबिनेट के समक्ष रखने का निर्देश दिया।
इसके अलावा, अदालत ने मुख्य सचिव को कैबिनेट को यह भी अवगत कराने का निर्देश दिया कि क्या इलाहाबाद उच्च न्यायालय और इसकी लखनऊ पीठ में इतने अपर महाधिवक्ता और स्थायी अधिवक्ता की जरूरत है जबकि 400 से अधिक सरकारी वकील पहले ही पैनल में शामिल हैं।
अदालत ने पाया कि महत्वपूर्ण मामलों में ज्यादातर अपर महाधिवक्ता और स्थायी अधिवक्ता पेश नहीं होते और विकास प्राधिकरणों और निगमों के मामलों में ही वे पेश होते दिखाई पड़ते हैं।
(यह सिंडिकेटेड न्यूज़ फीड से अनएडिटेड और ऑटो-जेनरेटेड स्टोरी है, ऐसी संभावना है कि लेटेस्टली स्टाफ द्वारा इसमें कोई बदलाव या एडिट नहीं किया गया है)













QuickLY