(सागर कुलकर्णी)
बैंकाक, तीन अप्रैल भारत और थाईलैंड ने अपने संबंधों को प्रगाढ़ कर रणनीतिक साझेदारी के स्तर तक ले जाने का बृहस्पतिवार को फैसला किया और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस बात पर जोर दिया कि दोनों देश हिंद-प्रशांत क्षेत्र में मुक्त, समावेशी और नियम आधारित व्यवस्था का समर्थन करते हैं तथा विस्तारवाद के बजाय विकास की नीति में विश्वास करते हैं।
मोदी ने यह टिप्पणी थाईलैंड की अपनी समकक्ष पैतोंगतार्न शिनावात्रा के साथ प्रतिनिधिमंडल स्तर की वार्ता के बाद एक संयुक्त प्रेस सम्मेलन में की। इस वार्ता के दौरान उन्होंने द्विपक्षीय सहयोग के विभिन्न क्षेत्रों पर व्यापक चर्चा की।
मोदी ने शिनावात्रा के साथ हुई बातचीत के बारे में कहा, "हमने भारत के पूर्वोत्तर राज्यों और थाईलैंड के बीच पर्यटन, संस्कृति और शिक्षा के क्षेत्र में सहयोग पर जोर दिया है। हमने आपसी व्यापार, निवेश और व्यवसायों के बीच आदान-प्रदान बढ़ाने पर चर्चा की।"
उन्होंने कहा कि एमएसएमई, हथकरघा और हस्तशिल्प में सहयोग के लिए भी समझौते किए गए हैं।
मोदी ने कहा कि भारत की 'एक्ट ईस्ट' नीति और हिंद-प्रशांत दृष्टिकोण में थाईलैंड का विशेष स्थान है।
मोदी ने कहा, "आज हमने अपने संबंधों को रणनीतिक साझेदारी के स्तर तक बढ़ाने का निर्णय लिया है। सुरक्षा एजेंसियों के बीच 'रणनीतिक वार्ता' स्थापित करने पर भी चर्चा हुई।"
उन्होंने कहा कि भारत आसियान में एकता और केंद्रीयता का पूर्ण समर्थन करता है।
मोदी ने कहा, "हिंद-प्रशांत क्षेत्र में हम दोनों एक मुक्त, समावेशी और नियम-आधारित व्यवस्था का समर्थन करते हैं। हम विस्तारवाद नहीं, विकासवाद की नीति में विश्वास करते हैं।"
उन्होंने कहा, "मैं अपनी यात्रा के अवसर पर 18वीं शताब्दी के 'रामायण' भित्ति चित्रों पर आधारित एक विशेष डाक टिकट जारी करने के लिए थाईलैंड सरकार का आभारी हूं।"
मोदी ने कहा कि प्रधानमंत्री शिनावात्रा ने उन्हें ‘त्रिपिटक’ भेंट किया।
उन्होंने कहा, "बुद्ध की भूमि भारत की ओर से, मैंने इसे हाथ जोड़कर स्वीकार किया।"
उन्होंने कहा कि भारत और थाईलैंड के बीच सदियों पुराने संबंध उनके गहरी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक डोर से बंधे हैं।
मोदी ने कहा कि बौद्ध धर्म के प्रसार ने हमारे देश के लोगों को हर स्तर पर जोड़ा है।
उन्होंने कहा, "अयुत्या से नालंदा तक विद्वानों का आना-जाना हुआ है। रामायण कथा थाईलैंड के लोक जीवन में गहराई से समाई हुई है।"
उन्होंने कहा, "और, संस्कृत-पाली का प्रभाव आज भी ओं और परंपराओं में परिलक्षित होता है।"
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