नयी दिल्ली, पांच जनवरी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) ने इज़राइल फलस्तीन के मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र के एक प्रस्ताव पर भारत के मतदान से अलग रहने को लेकर बृहस्पतिवार को केंद्र सरकार को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि यह इस बात का संकेत है कि देश फलस्तीन के “उत्पीड़कों’ का पक्ष ले रहा है।
संयुक्त राष्ट्र महासभा में 31 दिसंबर को स्वीकार किए गए प्रस्ताव पर मतदान से भारत अलग रहा था। इस प्रस्ताव में अंतरराष्ट्रीय न्यायालय से फलस्तीनी क्षेत्रों पर इज़राइल की ओर से लंबे वक्त से किए गए कब्जे के कानूनी परिणामों पर राय देने को कहा गया है।
प्रस्ताव के पक्ष में 87 और विरोध में 26 वोट पड़े थे। भारत और 52 अन्य देश मतदान से दूर रहे थे।
माकपा ने अपने मुखपत्र ‘पीपुल्स डेमोक्रेसी’ के ताज़ा संस्करण में कहा है, “ इस प्रस्ताव पर मतदान नहीं करके, भारत ने संकेत दिया है कि वह फलस्तीनी मुद्दे और दो राष्ट्र के सिद्धांत का दृढ़ समर्थन करने के अपने लंबे समय से अख्तियार किए गए रुख को बदल रहा है।”
संपादकीय में उन स्थितियों को रेखांकित किया गया है जिनमें फलस्तीनी लोगों ने "सात दशकों से अधिक समय तक विस्थापन और औपनिवेशिक कब्जे का सामना कया है।”
पार्टी ने अपने संपादकीय में कहा है, “ भारत ने अपने स्वतंत्रता संग्राम के समय से ही फलस्तीनी लोगों के प्रति पूरी सहानुभूति और एकजुटता प्रकट की है। लेकिन अब भाजपा शासकों का हिंदुत्व दृष्टिकोण भारत को इन बहादुर लोगों के उत्पीड़कों के पक्ष में ले जा रहा है।”
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