नयी दिल्ली, 11 अगस्त जलवायु परिवर्तन के कारण वैश्विक तापमान के लगातार बढ़ने से गर्मी संबंधी तनाव में इजाफे से तमिलनाडु में नमक-पैन (नमक कुंड) से जुड़े श्रमिकों के स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा पैदा हो गया है। एक नये अध्ययन में यह दावा किया गया है।
यह अध्ययन श्री रामचंद्र इंस्टीट्यूट ऑफ हायर एजुकेशन एंड रिसर्च की डॉ. विद्या वेणुगोपाल के नेतृत्व में एक टीम द्वारा किया गया। वेणुगोपाल ब्रिटेन के एनआईएचआर द्वारा वित्त पोषित वैश्विक स्वास्थ्य अनुसंधान केंद्र के सह-अन्वेषक भी हैं, जो गैर-संचारी रोगों के प्रतिच्छेदन और पर्यावरणीय परिवर्तन पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं।
यह अध्ययन तमिलनाडु में नमक-पैन के श्रमिकों पर किया गया। अधिकारियों ने बताया कि अध्ययन से खुलासा हुआ कि कमजोर व्यक्तियों को बचाने के लिए स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच को उन्नत बनाने और अनुकूलन रणनीति को अपनाने की तत्काल जरूरत है।
वर्ष 2017 से 2020 के बीच तमिलनाडु के सात ‘नमक पैन’ में 352 श्रमिकों पर अध्ययन किया गया। विभिन्न कार्य भूमिका के लिए निर्धारित कार्यभार और वर्गीकृत गर्मी संबंधी तनाव स्तर का मूल्यांकन किया गया।
प्रमुख संकेतक जैसे कि शिफ्ट से पहले और बाद की हृदय गति, शरीर का मुख्य तापमान, मूत्र जांच, पसीने की दर और किडनी के कार्य मापदंडों को मापा गया।
अध्ययन में पाया गया कि हर प्रतिभागी पर मध्यम स्तर से लेकर बहुत अधिक कार्यभार था। यह भी पाया गया कि करीब 90 फीसदी कर्मचारी खतरनाक रूप से गर्मी की तय सीमा से अधिक तापमान में काम कर रहे थे।
अंतरराष्ट्रीय नियम ऐसी परिस्थितियों में काम से नियमित विश्राम (ब्रेक) की अवधि का नियम लागू करने की सलाह देते हैं, लेकिन अध्ययन में शामिल किसी भी ‘नमक पैन’ में इस तरह के विश्राम की व्यवस्था नहीं थी।
अधिकारियों ने कहा, ‘‘विशेष चिंता का विषय किडनी की सेहत पर गर्मी का प्रभाव है। अध्ययन में सात प्रतिशत श्रमिकों में आकलित ग्लोमेरुलर फिल्टरेशन दर (ईजीएफआर) निम्न पाई गई, जो किडनी की कार्यप्रणाली का एक संकेतक है। ''
गर्मी से संबंधित तनाव को किडनी संबंधित विभिन्न समस्यायों से जोड़ा गया है। इनमें किडनी की पथरी, किडनी की गंभीर बीमारी और मूत्र नली में संक्रमण शामिल है।
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