ताजा खबरें | पिछले करीब 73 वर्षों में उच्चतम न्यायालय की संविधान पीठ ने 2,183 मामले सुने, निपटाए
Get latest articles and stories on Latest News at LatestLY. सरकार ने शुक्रवार को लोकसभा को बताया कि वर्ष 1950 से अब तक करीब 73 वर्ष में उच्चतम न्यायालय की संविधान पीठों द्वारा 2,183 मामले सुने एवं निपटाए गए और वर्तमान में उच्चतम न्यायालय के समक्ष निर्णय करने के लिए संविधान न्यायपीठ संबंधी 29 मामले लंबित हैं।
नयी दिल्ली, 28 जुलाई सरकार ने शुक्रवार को लोकसभा को बताया कि वर्ष 1950 से अब तक करीब 73 वर्ष में उच्चतम न्यायालय की संविधान पीठों द्वारा 2,183 मामले सुने एवं निपटाए गए और वर्तमान में उच्चतम न्यायालय के समक्ष निर्णय करने के लिए संविधान न्यायपीठ संबंधी 29 मामले लंबित हैं।
लोकसभा में माकपा के ए एम आरिफ के प्रश्न के लिखित उत्तर में विधि एवं न्याय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने यह जानकारी दी।
उन्होंने उच्चतम न्यायालय के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि वर्ष 1950 से 2023 तक इसकी स्थापना से लेकर आजतक उच्चतम न्यायालय की संविधान पीठों द्वारा सुने गए और निपटाए गए मामलों की कुल संख्या 2,183 है।
सरकार द्वारा सदन में पेश उच्चतम न्यायालय के आंकड़ों के अनुसार, 1950-59 तक संविधान पीठों द्वारा सुने गए और निपटाए गए मामलों की संख्या 440 थी जबकि वर्ष 1960-69 तक यह संख्या 956, वर्ष 1970-79 के बीच यह संख्या 292 तथा वर्ष 1980-89 के दौरान यह संख्या 110 दर्ज की गई।
इसके अनुसार, वर्ष 1990-99 के दौरान उच्चतम न्यायालय की संविधान पीठों द्वारा सुने गए और निपटाए गए मामलों की संख्या 157 थी जबकि वर्ष 2000-09 के बीच यह संख्या 138, वर्ष 2010-19 के बीच 71 और वर्ष 2020-23 के दौरान यह संख्या 19 दर्ज की गई।
विधि एवं न्याय मंत्री ने कहा कि ऐसे मामलों का निपटान और निर्णय न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र का विषय होता है और उसमें केंद्र सरकार की कोई भूमिका नहीं होती है।
मेघवाल ने बताया कि भरत के उच्चतम न्यायालय से प्राप्त जानकारी के अनुसार, 20 जुलाई 2023 तक संविधान न्यायपीठ संबंधी मामलों के रूप में उच्चतम न्यायालय के समक्ष निर्णय करने के लिए 29 मामले लंबित थे। इन 29 मामलों में से 18 मामले पांच न्यायाधीशों की न्यायपीठ के समक्ष लंबित थे।
उन्होंने कहा कि इनमें से छह मामले 7 न्यायाधीशों की न्यायपीठ के समक्ष लंबित हैं और पांच मामले 9 न्यायाधीशों की न्यायपीठ के समक्ष न्याय निर्णय के लिए लंबित हैं।
मेघवाल ने कहा, ‘‘ यह नहीं कहा जा सकता है कि संविधान न्यायपीठ के मामलों के लंबित रहने का कारण इन्हें शीघ्र निपटाने में रूचि की कमी है। उच्चतम न्यायालय से प्राप्त जानकारी के अनुसार, संविधान न्यायपीठ के मामलों के संबंध में कानून के जटिल मुद्दे शामिल होते हैं। ’’
केंद्रीय मंत्री ने कहा कि उक्त मुद्दों पर गहन विश्लेषण और कानून की गहन जांच की अपेक्षा की जाती है। अत: ऐसे मामलों के न्याय निर्णय के संबंध में कठोर मानदंड और समयसीमा निर्धारित करना संभव नहीं है।
उन्होंने कहा कि जहां तक इस संबंध में सुधारात्मक कार्रवाई का सवाल है, मामलों का न्याय निर्णय और शीघ्र निपटान न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र का विषय है और सरकार की इस मामले में कोई भूमिका नहीं होती है।
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