देश की खबरें | आईएमएसडी ने रुश्दी पर हमले को लेकर मुस्लिम संगठनों की चुप्पी पर सवाल उठाया
Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. लेखक सलमान रुश्दी पर हमले को लेकर मुस्लिम संगठनों की चुप्पी पर सवाल उठाते हुए ‘इंडियन मुस्लिम फॉर सेकुलर डेमोक्रेसी’ (आईएमएसडी) ने ईशनिंदा पर उनके (संगठनों के) रुख पर उनसे पुनर्विचार करने की अपील की। साथ ही, कहा कि यह रुख मुसलमानों को फायदा पहुंचाने से ज्यादा नुकसान पहुंचा रहा है।
नयी दिल्ली, 21 अगस्त लेखक सलमान रुश्दी पर हमले को लेकर मुस्लिम संगठनों की चुप्पी पर सवाल उठाते हुए ‘इंडियन मुस्लिम फॉर सेकुलर डेमोक्रेसी’ (आईएमएसडी) ने ईशनिंदा पर उनके (संगठनों के) रुख पर उनसे पुनर्विचार करने की अपील की। साथ ही, कहा कि यह रुख मुसलमानों को फायदा पहुंचाने से ज्यादा नुकसान पहुंचा रहा है।
आईएमएसडी ने रविवार को जारी एक बयान में यह कहा। इस बयान पर सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर, चुनाव विश्लेषक एवं राजनीतिक नेता योगेंद्र यादव और मैग्सायसाय पुरस्कार विजेता संदीप पांडे समेत अन्य ने हस्ताक्षर किए हैं।
आईएमएसडी की बेबसाइट के मुताबिक, यह भारतीय मुसलमानों का मंच है जो संयुक्त राष्ट्र द्वारा मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा और भारत के संविधान में निहित लोकतंत्र, पंथनिरपेक्षता, समानता और न्याय के मूल्यों के लिए प्रतिबद्ध है।
संगठन ने कहा कि रुश्दी पर हमला करने की साजिश ‘डर का माहौल’ बनाने के लिए रची गई थी। आईएमएसडी ने कहा कि प्रतिष्ठित लेखक पर हमले की निंदा किसी भी प्रतिष्ठित भारतीय संगठन ने नहीं की।
बयान में कहा गया है कि यही खामोशी इस्लाम को हिंसा और आतंक के मज़हब के रूप में चित्रित करने के लिए प्रोत्साहित करती है।
करीब हफ्ते भर पहले, रुश्दी पर अमेरिका के न्यूयॉर्क में 24 वर्षीय हादी मतार नाम के एक युवक ने एक कार्यक्रम के दौरान हमला किया था जिसमें लेखक गंभीर रूप से जख्मी हो गए थे।
मुंबई में जन्मे रुश्दी विवादित लेखक हैं जिन्होंने 'द सैटेनिक वर्सेज' किताब लिखी थी जिसके बाद उन्हें जान से मारने की धमकियां मिलती रही हैं।
आईएमएसडी ने दावा किया कि इस डर के माहौल के कारण ही बहुत कम लोग रुश्दी के साथ खड़े हुए। बयान में कहा गया है कि ‘इस्लामोफोब्स’ (ऐसे व्यक्ति जो इस्लाम या मुसलमान से नफरत करते हैं) दुनिया को यह बताते रहे हैं कि यही ‘बर्बरता’ ‘असली इस्लाम’ है और 33 साल बाद मुस्लिम देशों और संगठनों की वही खामोशी देखी गई।
बयान में दावा किया गया है कि मुस्लिम संगठनों को सिर्फ तभी मानवाधिकारों की याद आती है जब उन पर हमला किया जाता है। आईएमएसडी ने आरोप लगाया कि मुस्लिम संगठन मज़हबी मामलों पर उनसे अलग रूख रखने वाले लोगों, चाहे वे मुस्लिम हों या नहीं, को समान अधिकार और सम्मान नहीं देते हैं।
बयान में कहा गया है कि अल्पसंख्यक होने के नाते, भारतीय मुसलमानों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रा और असहमति के महत्व पर अधिकार-आधारित विमर्श का समर्थन करना चाहिए।
आईएमडीएस ने कहा, “ मुसलमानों को यह दलील देने के लिए हिंदू दक्षिणपंथियों की जरूरत नहीं है कि इस्लाम और मानवाधिकार असंगत हैं, बल्कि वे खुद लंबे वक्त से इसका प्रचार कर रहे हैं।”
बयान में कहा गया है, “ इस संकट के वक्त में, हम सलमान रुश्दी के साथ दृढ़ता से खड़े हैं और उनके जल्द ही सेहतमंद होने की कामना करते हैं। हम एक बार फिर सभी मुस्लिम संगठनों से अपील करते हैं कि वे ईशनिंदा पर अपने रुख के बारे में फिर से सोचें, क्योंकि ईशनिंदा मुसलमानों को फायदे से ज्यादा नुकसान पहुंचा रही है।”
(यह सिंडिकेटेड न्यूज़ फीड से अनएडिटेड और ऑटो-जेनरेटेड स्टोरी है, ऐसी संभावना है कि लेटेस्टली स्टाफ द्वारा इसमें कोई बदलाव या एडिट नहीं किया गया है)