देश की खबरें | सरकारी अधिकारियों द्वारा विधायकों की अनदेखी ‘शर्मनाक और दुखद’ : विधानसभा अध्यक्ष ऋतु खंडूरी

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देहरादून, आठ सितंबर उत्तराखंड विधानसभा की अध्यक्ष ऋतु खंडूरी ने शुक्रवार को सरकारी अधिकारियों द्वारा जनप्रतिनिधियों की अनदेखी को 'शर्मनाक और दुखद' बताया और इस संबंध में प्रदेश के मुख्य सचिव को अपने कक्ष में तलब किया।

विधानसभा के मानसून सत्र में प्रदेश के पांच बार के कांग्रेस विधायक प्रीतम सिंह द्वारा उठाए गए ‘विशेषाधिकार हनन’ के इस मामले को खंडूरी ने विधानसभा की विशेषाधिकार समिति को सौंप दिया है।

उन्होंने मामले पर चिंता जताते हुए सरकार को फटकार लगायी कि बार—बार कहे जाने के बावजूद कई अधिकारी जनप्रतिनिधियों की अनदेखी कर रहे हैं।

खंडूरी ने कहा, ‘‘विधानसभा एक संस्था है जो बहुत ही पवित्र और गरिमापूर्ण है। मैं तीसरी बार सरकार को यह निर्देश दे रही हूं कि विधायकों के प्रोटोकॉल को ताक पर नहीं रखा जा सकता।’’

उन्होंने नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि शायद समय आ गया है कि विधानसभा अध्यक्ष के माध्यम से मसूरी की लाल बहादुर शास्त्री प्रशासनिक अकादमी को इस संबंध में पत्र लिखना पड़ेगा।

खंडूरी ने कहा, ‘‘यह बहुत दुखद है। उत्तराखंड जैसी संस्कारों की धरती पर क्या हम एक दूसरे को सम्मान नहीं दे सकते। यह विधायक का प्रोटोकॉल है। ऐसी घटनाएं शर्मनाक हैं।’’

उन्होंने यह भी कहा कि इस संबंध में वह मुख्य सचिव को दोपहर के भोजनावकाश के समय अपने कक्ष में बुला रही हैं।

इससे पहले यह मामला उठाते हुए चकराता के सदस्य प्रीतम सिंह ने कहा कि उन्होंने प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना (पीएमजीएसवाई) के मुख्य अभियंता से मुलाकात का समय लिया था लेकिन बार—बार फोन करने के बावजूद वह नहीं मिले। इस संबंध में उन्होंने अपनी बात साबित करने के लिए सदन को अपने फोन की काल डिटेल्स देने की भी पेशकश की।

नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य ने भी कहा कि ऐसे अधिकारियों को सदन में बुलाया जाना चाहिए और यहीं उन पर कार्रवाई होनी चाहिए ताकि यह नजीर बन सके।

उन्होंने कहा, ‘‘हम कहते रहे हैं कि अफसरशाही बिल्कुल बेलगाम हो चुकी है। उन पर सरकार का नियंत्रण बिल्कुल नहीं रहा।’’

आर्य ने यह भी आरोप लगाया कि भ्रष्ट अधिकारियों को सरकार से संरक्षण मिल रहा है। उन्होंने कहा कि पीएमजीएसवाई में अगर परतें खोली जाएं तो इसमें घोटाले उजागर होंगे।

उन्होंने कहा कि ऐसे मामले सदन में पहले भी आए हैं लेकिन सरकार ने उनमें कभी कोई कार्रवाई नहीं की।

विधानसभा के कुछ अन्य सदस्यों ने भी सरकारी अधिकारियों द्वारा उनकी अनदेखी करने का आरोप लगाया।

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