बेघर जीते नहीं, केवल किसी तरह अपना अस्तित्व बचाते हैं: उच्च न्यायालय
दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा है कि बेघर लोग जीते नहीं, बल्कि अपना अस्तित्व बचाते हैं तथा वे संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त जीवन के मौलिक अधिकार से अनभिज्ञ होते हैं.
नयी दिल्ली, 5 जुलाई : दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court) ने कहा है कि बेघर लोग जीते नहीं, बल्कि अपना अस्तित्व बचाते हैं तथा वे संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त जीवन के मौलिक अधिकार से अनभिज्ञ होते हैं. अदालत ने नयी दिल्ली रेलवे स्टेशन के विस्तार के समय एक मलीन बस्ती (स्लम) से दूसरी मलीन बस्ती भेजे गये पांच व्यक्तियों के पुनर्वास का निर्देश देते हुए यह टिप्पणी की. न्यायमूर्ति सी हरिशंकर ने पांच झुग्गीवासियों की ओर से दायर याचिका की सुनवाई के दौरान कहा कि झुग्गीवासी ‘गरीबी और दरिद्रता से त्रस्त होते हैं’ और वे ऐसी जगहों पर मर्जी से नहीं रहते.
गौरतलब है कि इन झुग्गीवासियों ने रेलवे स्टेशन के पुन: आधुनिकीकरण के नाम पर दूसरी जगह से भी विस्थापित करने के कारण याचिका दायर की थी. अदालत ने कहा कि उनका (झुग्गीवासियों का) निवास स्थान उनके लिए आश्रय के अधिकार और उनके सिर पर छत से संबंधित अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार को सुरक्षित करने के लिए एक ‘अंतिम प्रयास’ है. न्यायाधीश ने कहा कि यदि वंचितों को न्याय नहीं मिलता और न्यायपालिका को संविधान के अनुच्छेद 38 एवं 39 के मद्देनजर संवेदनशील रहने की आवश्यकता है. इन प्रावधानों के तहत सरकार का दायित्व है कि वह सभी के लिए सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय सुनिश्चत करे और समाज से असमानता को कम करे. यह भी पढ़ें : एनबीए, एनएएसी को मिलाकर राष्ट्रीय प्रत्यायन एवं मूल्यांकन एजेंसी बनाने का सुझाव
अदालत ने अपने चार जुलाई के आदेश में कहा, ‘‘बेघर लोग निश्चित तौर पर जीते नहीं, बल्कि किसी तरह अपना अस्तित्व बचाते हैं. वे संविधान के अनुच्छेद 21 में प्रदत्त अधिकारों से अनभिज्ञ होते हैं.’’ अदालत ने अपने 32 पृष्ठ के आदेश में याचिकाकर्ताओं को पुनर्वास नीति के तहत रेलवे के समक्ष उपयुक्त दस्तावेज पेश करने की तारीख से छह महीने के भीतर वैकल्पिक रिहाइश आवंटित करने का आदेश दिया.
(The above story first appeared on LatestLY on Jul 05, 2022 06:01 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).

