प्रयागराज, 26 सितंबर इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने ‘सेक्स रिअसाइनमेंट सर्जरी’ (लिंग परिवर्तन सर्जरी) के लिये नियम बनाने में उदासीनता बरतने पर नाराजगी जाहिर करते हुए राज्य सरकार को सुनवाई की अगली तारीख तक लंबित आवेदन पर उचित निर्णय करने का निर्देश दिया है।
राज्य सरकार ने 2014 के उच्चतम न्यायालय के निर्णय के मुताबिक, दिशानिर्देश नहीं बनाए हैं। उच्चतम न्यायालय ने अपने निर्णय में यह सुनिश्चित करने पर जोर दिया था कि ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए अस्पताल के भीतर चिकित्सा देखभाल के साथ ही अलग से सार्वजनिक सुविधाएं मुहैया कराई जाएं।
न्यायमूर्ति अजित सिंह ने उत्तर प्रदेश पुलिस में एक अविवाहित महिला कांस्टेबल द्वारा दायर एक रिट याचिका पर सुनवाई के दौरान उक्त टिप्पणी की। महिला कांस्टेबल ने ‘सेक्स रिअसाइनमेंट सर्जरी’ (एसआरएस) कराने की अनुमति मांगी है।
याचिकाकर्ता का दावा है कि वह ‘जेंडर डाइस्फोरिया’ (वह स्थिति जिसमे व्यक्ति को यह महसूस होता है कि उसका प्राकृतिक लिंग उसके लैंगिक पहचान से मेल नहीं खाता है) की अनुभूति कर रही है, इसलिए वह एसआरएस कराने की इच्छा रखती है।
सरकारी वकील ने याचिकाकर्ता के आवेदन पर निर्णय के लिए तीन महीने की मोहलत मांगी लेकिन अदालत ने यह मोहलत देने से इनकार करते हुए कहा, “इस परिस्थिति में यह निर्देश दिया जाता है कि अगली तारीख 18 अक्टूबर, 2023 तक लंबित आवेदन पर उचित निर्णय किया जाए।”
अदालत ने उच्चतम न्यायालय के निर्णय का अनुपालन नहीं करने पर अपना असंतोष व्यक्त करते हुए कहा, “जहां केंद्र सरकार ने 15 अप्रैल, 2014 को निर्णय आने के तुरंत बाद इस पर कार्रवाई कर कानून बनाया, वहीं राज्य सरकार मूक दर्शक बनी रही और आज की तिथि तक कोई निर्णय नहीं किया गया है।”
अदालत ने कहा, “जिस तरह से तीन महीने का समय मांगा गया है, यह दर्शाता है कि राज्य सरकार फिर से बहुत हल्का नजरिया अपना रही है। इस बात का कोई कारण नहीं बताया गया कि राज्य सरकार हलफनामा दाखिल करने के लिए क्यों तीन महीने का समय चाहती है।”
अदालत ने पिछले 18 सितंबर को यह निर्देश पारित किया।
(यह सिंडिकेटेड न्यूज़ फीड से अनएडिटेड और ऑटो-जेनरेटेड स्टोरी है, ऐसी संभावना है कि लेटेस्टली स्टाफ द्वारा इसमें कोई बदलाव या एडिट नहीं किया गया है)













QuickLY