नैनीताल, 14 मई उत्तराखंड उच्च न्यायालय की एक पीठ भ्रष्टाचार के मामलों को उजागर करने वाले भारतीय वन सेवा (आईएफएस) के अधिकारी संजीव चतुर्वेदी से संबंधित एक मामले की सुनवाई से अलग हो गई है।
मुख्य न्यायाधीश विपिन सांघी और न्यायमूर्ति राकेश थपलियाल की पीठ ने चतुर्वेदी की याचिका पर सुनवाई से अलग होते हुए उसे किसी अन्य पीठ के समक्ष सूचीबद्ध किए जाने का आदेश दिया।
यह मामला चतुर्वेदी के नयी दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में मुख्य सतर्कता अधिकारी (सीवीओ) के पद पर उनके दो वर्ष के कार्यकाल से संबंधित है। उस दौरान चतुर्वेदी ने प्रतिष्ठित संस्थान के वरिष्ठ अधिकारियों और चिकित्सकों की संलिप्तता वाले भ्रष्टाचार के कई मामलों को उजागर किया था।
चतुर्वेदी को बाद में पद से हटा दिया गया था और उन्हें वार्षिक प्रदर्शन मूल्यांकन रिपोर्ट में शून्य ‘ग्रेडिंग’ दी गयी थी जिसे उन्होंने 2017 में केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (कैट) की नैनीताल पीठ के सामने चुनौती दी थी। चतुर्वेदी ने अपनी याचिका में इसे भ्रष्टाचार उजागर करने के कारण अपने खिलाफ 'प्रतिशोधात्मक कार्रवाई' बताया था।
याचिका के जवाब में कैट ने स्वास्थ्य मंत्रालय और एम्स, दिल्ली को चतुर्वेदी द्वारा सीवीओ के रूप में जांचे गए भ्रष्टाचार के रिकॉर्ड को पेश करने के आदेश दिए थे।
इस साल फरवरी में एम्स ने उत्तराखंड उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर कर कैट के आदेश को निरस्त करने तथा इसके क्रियान्वयन पर रोक लगाने का अनुरोध किया था।
चतुर्वेदी ने एम्स के सीवीओ के रूप में जून 2012 से अगस्त 2014 तक के अपने कार्यकाल के दौरान वरिष्ठ अधिकारियों एवं चिकित्सकों की संलिप्तता वाले भ्रष्टाचार से संबंधित कई मामलों की जांच शुरू की थी लेकिन उन्हें पद से हटाए जाने के बाद ये जांचें रूक गयीं।
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