बोटाद, तीन सितंबर गुजरात के बोटाद जिले के एक मंदिर में भगवान हनुमान को स्वामीनारायण संप्रदाय के संत सहजानंद स्वामी के सामने घुटने टेकते हुए चित्रित करने वाले भित्तिचित्र क्षतिग्रस्त करने और विरूपित करने के आरोप में पुलिस ने तीन व्यक्तियों को गिरफ्तार किया है। एक अधिकारी ने रविवार को यह जानकारी दी।
आरोपियों में से एक की पहचान हर्षद गढवी के रूप में हुई है। सोशल मीडिया पर सामने आये वीडियो में उक्त आरोपी जिले के सालंगपुर स्थित मंदिर में विवादास्पद भित्तिचित्र तोड़ते हुए दिखा था।
पुलिस अधीक्षक किशोर बलोलिया ने बताया कि दो अन्य आरोपी जयसिंह भरवाड और बलदेव भरवाड भी उसके सहयोगी थे और दोनों उसके साथ मौके पर गए थे।
मंदिर प्रबंधन ने कुछ महीने पहले, मंदिर परिसर में भगवान हनुमान की 54 फुट की मूर्ति स्थापित की थी।
इसके आसन की दीवार भित्तिचित्रों से ढकी हुई है, जिनमें से कम से कम दो भित्तिचित्रों के कारण विवाद उत्पन्न हुआ जिसमें भगवान हनुमान को सहजानंद स्वामी को प्रणाम करते हुए दिखाया गया था।
विशेष रूप से, कई पंथों में विभाजित स्वामीनारायण संप्रदाय सहजानंद स्वामी (1781-1830) को भगवान स्वामीनारायण के रूप में संदर्भित करता है।
प्रथम दृष्टया, गढवी बैरिकेड पार करता हुआ प्रतिमा तक पहुंच गया और उसने भित्तिचित्रों को क्षतिग्रस्त करने के साथ ही उस पर कालिख पोत दी। पुलिस ने शनिवार को उसे पकड़ लिया। गढवी के इस कृत्य का एक वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आया।
बरवाला पुलिस थाने के एक अधिकारी बताया कि शनिवार रात को गिरफ्तार किए गए तीनों आरोपियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 295 (ए) (धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना), 153 (ए) (धर्म आदि के आधार पर विभिन्न समूहों के बीच शत्रुता को बढ़ावा देना), 506 (2) (आपराधिक धमकी), 120 (बी) (आपराधिक साजिश) के तहत मामला दर्ज किया गया है।
यह घटना कुछ हिन्दू धर्मगुरुओं द्वारा विवादित भित्तिचित्रों को हटाने की मांग के कुछ दिनों बाद हुई।
इस बीच, मंदिर के आसपास सुरक्षा कड़ी कर दी गई गई है। पूजा-अर्चना के लिए मंदिर के अंदर जाने की अनुमति नहीं मिलने के चलते श्रद्धालु रविवार को मंदिर परिसर के बाहर एकत्रित हो गए। उनमें से कुछ भित्तिचित्रों में चित्रण के विरोध में बैनर लिये हुए थे।
कथावाचक मोरारी बापू ने बिना किसी का नाम लिए भित्तिचित्रों में चित्रण का विरोध किया था। इसके अलावा अहमदाबाद के भगवान जगन्नाथ मंदिर के दिलीपदासजी महाराज ने भी कहा था कि किसी को भी ऐसे कृत्य में लिप्त नहीं होना चाहिए जो किसी धर्म का अपमान करते हों।
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