अहमदाबाद, 24 जुलाई गुजरात उच्च न्यायालय ने जूनागढ़ शहर में एक दरगाह को ढहाये जाने के बाद हुई हिंसा के बाद गिरफ्तार किए गए लोगों को सरेआम कथित तौर पर ‘बेल्ट’ से पीटने के मामले से जुड़ी एक अवमानना अर्जी पर सोमवार को पुलिस उपायुक्त समेत 33 पुलिसकर्मियों को नोटिस जारी कर उनका जवाब मांगा।
न्यायमूर्ति ए.एस. सुपिहिया और न्यायमूर्ति एम.आर मेंगडे की पीठ ने दो व्यक्तियों की अर्जी पर प्रतिवादियों को नोटिस जारी कर सात अगस्त तक जवाब देने को कहा। अर्जी में पुलिसकर्मियों पर हिरासत में हिंसा, उत्पीड़न, पिटाई और सार्वजनिक रूप से बेल्ट से पीटने का आरोप लगाया गया है।
उच्च न्यायालय की वेबसाइट पर अपलोड किए गए आदेश में कहा गया है, “प्रतिवादियों को सात अगस्त तक नोटिस का जवाब देना है। प्रतिवादी अधिकारियों को निर्देश दिया जाता है कि वे सुनवाई की अगली तारीख तक वर्तमान अवमानना अर्जी पर जवाबी हलफनामा दाखिल करें।”
अर्जी में दावा किया गया है कि एक पुलिस उपाधीक्षक, तीन निरीक्षकों और उप निरीक्षकों समेत 33 पुलिसकर्मियों ने एक मामले में व्यक्ति को गिरफ्तार करने या हिरासत में लेने के बाद हिरासत में हिंसा की रोकथाम से संबंधित उच्चतम न्यायालय के दिशानिर्देशों का उल्लंघन कर अदालत की अवमानना की है।
अर्जी देने वालों के वकील आनंद याग्निक ने बताया कि अदालत ने प्रतिवादियों को आरोपों पर जवाब के साथ हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया और मामले की सुनवाई दो सप्ताह के लिए स्थगित कर दी।
अर्जी के अनुसार, जूनागढ़ शहर में 16 जून, 2023 की शाम को अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों का एक समूह एक 'दरगाह' के बाहर इकट्ठा हुआ था, जिसे डर था कि हाल के दिनों में ऐसी कुछ अन्य धार्मिक संरचनाओं की तरह इसे भी ध्वस्त कर दिया जाएगा।
पीड़ितों के अनुसार पुलिस ने लोगों से तितर-बितर होने का आग्रह किया, जिसके बाद झड़प शुरू हो गई। इसके बाद हुए पथराव में कुछ पुलिसकर्मी घायल हो गए। स्थिति को काबू करने के लिए पुलिस ने 400 से 500 लोगों के समूह पर लाठीचार्ज किया और आंसू गैस के गोले दागे।
अर्जी में आरोप लगाया गया है कि पथराव में प्रतिवादी पुलिस उपायुक्त और कुछ अन्य पुलिसकर्मी घायल हो गए, जबकि कुछ वाहन क्षतिग्रस्त हो गए। पुलिस ने कई लोगों को हिरासत में लिया और गिरफ्तार किया, जिसके बाद उन्हें शारीरिक यातना दी गई तथा अपशब्द कहे गए।
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