देश की खबरें | गोपीचंद का मानना है कि नौकरशाहों को सलाम करने से बेहतर भविष्य के हकदार हैं खिलाड़ी

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नयी दिल्ली, 19 फरवरी भारत के मुख्य बैडमिंटन कोच पुलेला गोपीचंद ने बुधवार को खिलाड़ियों को संन्यास के बाद सम्मान दिए जाने का आह्वान करते हुए कहा कि खिलाड़ी अपने खेल के दिनों में देश के लिए सब कुछ समर्पित करने के बाद ‘नौकरशाहों को सलाम करने’ से कहीं अधिक के हकदार हैं।

हैदराबाद के 51 वर्षीय पूर्व खिलाड़ी गोपीचंद ने करियर के बाद बेहतर अवसरों की आवश्यकता पर भी जोर दिया और कहा कि खिलाड़ियों के लिए अपने करियर से संन्यास लेने के बाद सार्थक भूमिका निभाने के लिए वित्तीय स्थिरता महत्वपूर्ण है।

भारत में अब खेल को एक व्यावहारिक करियर के रूप में देखा जाता है लेकिन गोपीचंद ने एक महत्वपूर्ण मुद्दे पर प्रकाश डाला कि उन खिलाड़ियों का क्या होता है जो अपना जीवन खेल को समर्पित करते हैं लेकिन शीर्ष पर नहीं पहुंच पाते हैं?

गोपीचंद ने पीटीआई से कहा, ‘‘कई साल पहले यह सवाल नहीं उठता था क्योंकि खेल इतना बड़ा नहीं था। खेल को पेशे के रूप में अपनाने वाले लोगों की संख्या बहुत बड़ी नहीं थी। लेकिन आज हमारे पास ऐसे खिलाड़ी हैं जो पूरी तरह से खेल के प्रति समर्पित हैं, जो शिक्षा नहीं लेते।’’

उन्होंने कहा, ‘‘मेरी चुनौती यह है कि मैं उन्हें अन्य पेशे की तरह सम्मान और वित्तीय स्थिरता प्रदान करने वाली सार्थक भूमिकाओं में कैसे रखूं?’’

गोपीचंद ने कहा कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गौरव हासिल करने वाले शीर्ष खिलाड़ियों का तो अच्छा ख्याल रखा जाता है लेकिन चिंता उन लोगों की है जो थोड़े अंतर से चूक जाते हैं।

उन्होंने कहा, ‘‘अगर आप शीर्ष पर पहुंच जाते हैं तो सरकार आपका बहुत अच्छे से ख्याल रखती है। वे नौकरी, जमीन, पैसा देते हैं। शानदार, कोई शिकायत नहीं।’’

गोपीचंद ने कहा, ‘‘उदाहरण के लिए, मान लीजिए कि आप खेलना जारी रखते हैं और 24 या 25 साल की उम्र तक पहुंच जाते हैं लेकिन भारतीय टीम में जगह नहीं बना पाते हैं। आप मनु भाकर, निकहत जरीन या अमन सहरावत के बाद दूसरे, तीसरे या चौथे स्थान पर हैं। उनका क्या होगा? ऐसे बहुत से लोग हैं। उनका जीवन खत्म हो गया है क्योंकि उनके पास और कुछ नहीं है।’’

यहां तक ​​कि ओलंपिक पदक जीतने वालों के लिए भी, खेल के बाद उनका करियर अक्सर निराशाजनक रूप से सीमित होता है।

गोपीचंद ने कहा, ‘‘आप साक्षी मलिक, अमन सहरावत या विजय कुमार को ही लीजिए। उन्होंने ओलंपिक पदक जीता है, जो खेल का शिखर है लेकिन वे हर दिन उनके कार्यालय जाएंगे और जूनियर स्तर के आईआरएस अधिकारी को सलाम करेंगे... मैं आपको सलाम क्यों करूं?’’

पूर्व ऑल इंग्लैंड चैंपियन ने कहा कि खिलाड़ियों को सार्थक भूमिकाओं को निभाने का अवसर दिया जाना चाहिए।

गोपीचंद ने कहा, ‘‘हमें मसूरी इंस्टीट्यूट भेजिए, हमें प्रशासन सिखाइए। हमें आईएसबी भेजिए, हमें व्यवसाय सिखाइए। और अगर हम असफल होते हैं तो यह अलग बात है। लेकिन आपने कोशिश भी नहीं की। हमने अपना पूरा जीवन खेल को, देश को दिया है और फिर हमें कुछ नहीं मिला।’’

उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि समाज को खिलाड़ियों और उनके खेल के बाद के करियर के बारे में अपना नजरिया बदलना चाहिए।

गोपीचंद ने माना कि क्रिकेट एक अपवाद है जहां काफी पैसा है लेकिन अधिकांश खेलों में शीर्ष पर पहुंचना भी वित्तीय रूप से सुरक्षित जीवन की गारंटी नहीं है।

उन्होंने वैश्विक मॉडल की ओर इशारा किया जहां विश्वविद्यालय खेल और शिक्षा को सहजता से एकीकृत करते हैं।

द्रोणाचार्य पुरस्कार विजेता गोपीचंद कहा, ‘‘यदि आपको स्टैनफोर्ड में 25 पदक मिलते हैं, लॉफबोरो में 17 पदक मिलते हैं तो उन विश्वविद्यालयों में खेल इतना बड़ा है कि वे अध्ययन और प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं। फॉर्च्यून 500 कंपनियों में से 80 प्रतिशत में पेशेवर खिलाड़ी नेतृत्व की भूमिका में हैं।’’

उन्होंने कहा, ‘‘खेल के लिए शिक्षा महत्वपूर्ण है और खेल शिक्षा के लिए महत्वपूर्ण हैं। इसे अलग-अलग करने से ऐसा नहीं होता है।’’

गोपीचंद ने कहा कि मध्यम वर्ग के परिवारों को यह पहचानने की आवश्यकता है कि हर युवा खिलाड़ी सचिन तेंदुलकर या पीवी सिंधू नहीं बन सकता।

उन्होंने कहा, ‘‘यदि ऐसा होता है तो भगवान की कृपा से शानदार होगा। लेकिन 100 में से 99 बार ऐसा नहीं होगा। आपको इसमें उतरने से पहले यह याद रखना होगा।’’

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