तिरुवनंतपुरम, दो अक्टूबर ऐसे समय में जब लोग एलोपैथिक दवा का उपयोग करने से डरते थे, एक युवा रानी ने 19वीं शताब्दी की शुरुआत में दक्षिण भारत में अपनी रियासत में एक टीकाकरण इकाई की शुरूआत की थी और राज परिवार के सदस्यों के पहले टीकाकरण कराने पर जोर दिया था।
महिला शासक रानी गौरी लक्ष्मीबाई ने 1810-1814 तक त्रावणकोर की तत्कालीन रियासत के शासन की बागडोर संभाली थी। उन्होंने राज परिवार को चेचक का टीका लगवाने के लिए किया, ताकि अंग्रेजी(एलोपैथिक) दवाओं से जुड़े डर को दूर किया जा सके और इस तरह इसका लाभ आम लोगों तक पहुंचाया जा सके।
उनकी बहन और उत्तराधिकारी रानी गौरी पार्वती बाई ने आम लोगों के इलाज के लिए एक धर्मार्थ औषधालय की स्थापना करके मिशन को आगे बढ़ाया।
देश की आजादी तक के दशकों में, रियासत ने एक सिविल अस्पताल, महिलाओं और बच्चों के लिए विशेष उपचार केंद्र और कुष्ठ रोग विभाग, नेत्र अस्पताल, स्वच्छता विभाग और एक सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रयोगशाला खोली गई। रेबीज और चेचक के टीकों का निर्माण किया गया।
ऐसे समय में जब सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा का वर्तमान ‘‘केरल मॉडल’’ दुनिया भर में प्रशंसा प्राप्त कर रहा है, इसकी जड़ें और नींव राज परिवार द्वारा लिए गए प्रगतिशील और साहसिक निर्णयों में देखी जा सकती हैं।
एलोपैथिक दवाएं और एक बेहतर सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली की अवधारणाउ न केवल त्रावणकोर में, बल्कि कोचीन और ब्रिटिश मालाबार में भी लोकप्रियता हासिल करने लगी।
ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार, राज्य के अंतर्गत त्रावणकोर में स्थापित होने वाला पहला चिकित्सा संस्थान लक्ष्मी बाई के शासन में खोली गई ‘‘पैलेस डिस्पेंसरी’ थी।
इसके अनुसार, कोचीन का पहला चिकित्सा औषधालय 1818 में मट्टनचेरी में खोला गया था, लेकिन मालाबार में आधुनिक चिकित्सा सुविधाएं बाद में शुरू हुईं।
चिकित्सा इतिहासकार के. राजशेखरन नायर ने कहा कि भारत के अन्य हिस्सों की तरह, पारंपरिक चिकित्सा प्रणाली विशेष रूप से आयुर्वेद और स्वदेशी उपचार पद्धतियां इन रियासतों में भी ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन में आने तक मुख्य रूप से प्रचलित थीं।
उन्होंने ‘पीटीआई-’ से कहा, ‘‘यूरोपियों के आगमन और ईसाई मिशनरियों के प्रभाव, विशेष रूप से लंदन मिशनरी सोसाइटी (एलएमएस) ने आधुनिक दवाओं को यहां के राज परिवार के सदस्यों के बीच और आम लोगों के बीच स्वीकृति प्राप्त करने में मदद की।’’
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