देश की खबरें | दिल्ली के ‘लोहे के पुल’ से पहली बार 1866 में गुजरी थी ट्रेन

(कुणाल दत्त)

नयी दिल्ली, 16 जुलाई दिल्ली के 150 साल पुराने ऐतिहासिक यमुना ब्रिज को 1866 में पहली बार कलकत्ता और दिल्ली को रेल नेटवर्क से जोड़ने के लिए खोला गया था। इस पुल को इंजीनियरिंग की असाधारण उपलब्धि माना गया था।

‘लोहे के पुल’ के नाम से मशहूर यह पुल डेढ़ सदी से अधिक समय में इतनी बार बाढ़ का गवाह बना है कि इसे यमुना नदी में पानी के खतरे के स्तर को मापने का संदर्भ बिंदु भी माना जाने लगा है।

यह नदी पिछले सप्ताह से उफान पर है और बुधवार को इसका जलस्तर 1978 में बने 207.49 मीटर के रिकॉर्ड को तोड़ते हुए 207.71 मीटर के स्तर पर पहुंच गया था, जिससे दिल्ली के कई अहम हिस्सों में बाढ़ आ गई थी।

यमुना का जलस्तर बढ़ने के कारण भारतीय रेल की जीवनरेखा माने जाने वाले इस ऐतिहासिक पुल को यातायात के लिए अस्थायी रूप से बंद कर दिया गया था।

रेलवे के पुलों, इमारतों और नेटवर्क विस्तार पर व्यापक अनुसंधान करने वाले भारतीय रेलवे के अधिकारियों और विशेषज्ञों ने पुराने यमुना ब्रिज को ‘‘भारत की अमूल्य धरोहर’’ बताया है।

भारतीय रेलवे के एक वरिष्ठ अधिकारी पी के मिश्रा ने ‘पीटीआई-’ से कहा, ‘‘यह लोहे का एक पुराना घोड़ा है, जो 1860 से यमुना नदी पर सरपट दौड़ रहा है। इसने भांप से चलने वाली ट्रेन के युग, डीजल युग और बिजली से चलने वाली ट्रेन के युग को देखा है।’’

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