नयी दिल्ली, 26 जुलाई बीसवीं सदी की महान साहित्यकार वर्जीनिया वुल्फ ने किसी अन्य समय और संदर्भ में कहा था, ‘‘ कोई तब तक सोच नहीं सकता, प्रेम नहीं कर सकता, सो नहीं सकता जबतक कि वह ठीक से खाना नहीं खाता।’’ दशकों बाद जब कोविड-19 का प्रसार जारी है ये शब्द उन लोगों के लिए प्रासंगिक हो गए है जो सामान्य हालात होने पर कम से कम रेस्तरां में जाकर बढ़िया खाने की उम्मीद कर रहे हैं।
गत महीनों में भारत के शहरी कुलीन वर्ग में बाहर जाकर खाने की परिपाटी में कमी आई है, लेकिन एक बार फिर यह स्थिति लौटने की उम्मीद है क्योंकि करीब चार महीने के बाद रेस्तरां उद्योग लोगों का फिर से स्वागत करने की तैयारी कर रहा हैं।
कोरोना वायरस की महामारी के चलते खाद्य एवं पेय उद्योग खुद को परिवर्तित कर रहा है ताकि समय के साथ सामंजस्य बिठाया जा सके। धीमी ही गति से सही वह धीरे-धीरे इस संकट से खुद को बाहर निकाल रहे हैं, कई रेस्तरां ने ऑनलाइन ऑर्डर पर खाना पहुंचाने की शुरुआत की है और कई डिजिटल उपायों से स्वयं को पुर्नस्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं।
सामाजिक दूरी, खुली रसोईघर, नियमित तौर पर सैनिटाइजेशन, रेस्तरां कर्मियों से न्यूनतम संपर्क और डिजिटल मेन्यु कुछ उपाय हैं जो ग्राहकों का भरोसा जीतने के लिए अपनाए जा रहे हैं।
मार्च महीने में कोविड-19 की वजह से लागू राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन के बाद से ही घर में बैठकर उब चुकी शोभा मिश्रा उन लोगों में हैं जो अपनी पसंदीदा कॉफी और कुकीज की तलाश में घर से बाहर कुछ समय बिताने के लिए निकल रही हैं।
मीडिया पेशेवर मिश्रा दक्षिण दिल्ली के अपने नियमित ठिकाने ब्लू टोकाई में जाने पर स्वच्छता और सामजिक दूरी का अतिरिक्त ख्याल रखती हैं। सामाजिक दूरी के नये नियम के बीच कैफे की टेबल पर क्यूआर कोड उनका ध्यान विशेष तौर पर आकर्षित करता है।
उन्होंने कहा, ‘‘ यह राहत है कि कैफे में भीड़ नहीं है। इसके अलावा टेबल पर रखे क्यूआर कोड को फोन से स्कैन करते ही पूरा मेन्यु (व्यंजन सूची) सामने आ जाता है।’’
गुरुग्राम में मानव संसाधन प्रबंधक के तौर पर काम करने वाली अंकिता वर्मा ने पीटीआई- को बताया कि बाहर खाना खाने से अधिक बाहर जाकर खाने के अनुभव की कमी महसूस कर रही हैं।
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