देश की खबरें | परिवार अदालत जज ने मोबाइल नंबर साझा किया, कक्ष में पार्टी से मिले, हाईकोर्ट ने आदेश रद्द किया

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नयी दिल्ली, 15 जून दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक नाबालिग बच्चे की अभिरक्षा से संबंधित परिवार अदालत के फैसले को रद्द कर दिया है, क्योंकि बच्चे की मां ने संबंधित न्यायाधीश द्वारा पक्षकारों से अपना मोबाइल नंबर साझा किये जाने और पिता से अपने कक्ष में मुलाकात करने को लेकर पक्षपात की आशंका जताई थी।

न्यायमूर्ति दिनेश कुमार शर्मा ने कहा कि यद्यपि परिवार अदालत के न्यायाधीश की सत्यनिष्ठा, तटस्थता और न्यायिक स्वतंत्रता के संबंध में कोई संदेह नहीं है, लेकिन न्यायाधीशों को खुद ही इस बात को ध्यान में रखना होगा कि उनके आचरण को देखा और नोट किया जाता है, इसलिए वे कोई ऐसा काम नहीं कर सकते, जो वादियों-प्रतिवादियों और वकीलों के मन में जरा सी भी शंका पैदा करता हो।

मौजूदा मामले में, मां ने उच्च न्यायालय के समक्ष ‘पक्षपात की आशंका के संबंध में कई घटनाएं सुनाईं’ और दावा किया कि परिवार अदालत ने मुलाकात के मुद्दे पर आदेश जारी करते वक्त केवल बच्चे के पिता और उनके परिवार के अधिकारों पर अपना ध्यान केंद्रित किया। मां ने यह भी दावा किया कि परिवार अदालत ने इस बात को नजरंदाज किया कि नाबालिग बच्चा उसके ऊपर पूरी तरह निर्भर रहा है और वह उससे (मां से) कभी अलग नहीं रहा है।

उच्च न्यायालय ने माना कि परिवार अदालत के न्यायाधीश के लिए यह उचित नहीं है कि वह अपना व्यक्तिगत मोबाइल नंबर पक्षकारों के साथ साझा करे, साथ ही इसने यह भी कहा कहा कि यह एक तय सिद्धांत है कि न्याय न केवल किया जाना चाहिए, बल्कि यह होते हुए दिखना भी चाहिए।

अदालत ने अपने तीन जून के आदेश में कहा, ‘‘इस अदालत को परिवार न्यायालय के विद्वान न्यायाधीश की सत्यनिष्ठा, तटस्थता और न्यायिक स्वतंत्रता पर भी कोई संदेह नहीं है। हालांकि, दुर्भाग्य से, दोनों पक्षों के साथ अपना व्यक्तिगत मोबाइल नंबर साझा करने और कक्ष में एक पक्षकार से मिलने के न्यायाधीश के व्यवहार ने अनावश्यक रूप से पूर्वाग्रह की आशंका को जन्म दिया है।’’

अदालत ने नाबालिग बच्चे की अभिरक्षा संबंधी याचिका को फिर से बहाल करते हुए संबंधित परिवार अदालत के प्रधान न्यायाधीश को यह मामला खुद अपने पास रखने और कानून के अनुसार निर्णय लेने का निर्देश दिया।

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