घर जाने के लिए संघर्ष करते श्रमिकों के परिजन कठिन समय में उन्हें अपने पास चाहते हैं

लॉकडाउन के कारण व्यवसाय समाप्त होने से पहले बिहार से आए 27 वर्षीय महतो उत्तर पूर्वी दिल्ली के सीलमपुर में बेलदार का काम करते थे लेकिन अब वह और उनके साथी बेरोजगार हैं।

जमात

नयी दिल्ली, 19 मई बब्बन महतो को दो महीने की अपनी बच्ची को पहली बार देखने के लिए थोड़ा और इंतजार करना पड़ सकता है।

लॉकडाउन के कारण व्यवसाय समाप्त होने से पहले बिहार से आए 27 वर्षीय महतो उत्तर पूर्वी दिल्ली के सीलमपुर में बेलदार का काम करते थे लेकिन अब वह और उनके साथी बेरोजगार हैं।

उन्होंने बताया, “परिवार में अकेला मैं ही कमाने वाला हूं। पहले उत्तर पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों के कारण व्यवसाय प्रभावित हुआ और अब लॉकडाउन के कारण लोग घुटनों पर आ गए हैं।”

बब्बन ने कहा कि वह सिवान जिले में स्थित घर जाने के लिए दो मई को ट्रेन पकड़ने वाले थे लेकिन ट्रेन रद्द हो गई।

बब्बन और उनके साथ काम करने वाले श्रमिकों ने ‘श्रमिक स्पेशल ट्रेन’ में यात्रा करने के लिए पांच मई को पंजीकरण करवाया था।

दो सप्ताह बीत चुके हैं लेकिन उन्हें पता नहीं है कि उन्हें किस ट्रेन से घर जाना है।

टी शर्ट की छपाई के कारखाने में काम करने वाले जितेंद्र महतो (35) ने कहा, “दो दिन पहले हमने दिल्ली सरकार द्वारा उपलब्ध कराए गए लिंक पर भी पंजीकरण करवाया था। उस पर लिखा है कि आवेदन सफलतापूर्वक जमा हो चुका है लेकिन हमें किस ट्रेन से जाना है यह कैसे पता चलेगा?”

जितेंद्र ने कहा, “मेरे पास दो सौ रुपये बचे हैं। मुझे रद्द किए गए टिकट का पैसा भी वापस नहीं मिला। घर पर हमारे पास खेती के लिए जमीन भी नहीं है। मुझे पता है वहां कठिनाई होगी, लेकिन मैं अपने परिवार के साथ रहूंगा। उनके साथ नमक-रोटी खा कर भी मैं सुखी रहूंगा।”

बिहार के छपरा जिले के निवासी शैलेन्द्र कुमार (30) का कहना है कि उन्होंने अभी-अभी खबर देखी जिसमें दिल्ली सरकार प्रवासी श्रमिकों को उनके घर पहुंचाने के लिए मंगलवार को 16 स्पेशल ट्रेन की व्यवस्था करने की बात कह रही है।

उन्होंने कहा, “हम अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं।”

कुमार ने कहा कि वह, बब्बन और जितेंद्र समेत सभी साथियों ने मंगलवार को सुबह छह बजे किराए का घर छोड़ दिया।

उन्होंने कहा, “हम झंडेवालान मंदिर गए जहां पुलिस ने हमें भगा दिया। हम अंबेडकर स्टेडियम के पास आराम करने के लिए गए तो पुलिसकर्मी डंडे लेकर हमारे पीछे दौड़े। वहां से भागते हुए हम कमला मार्केट चले गए।”

उन्होंने कहा कि पुलिसकर्मी प्रवासी श्रमिकों से अपने आवास पर जाने को कह रहे हैं।

कुमार ने कहा, “वे निर्दयी हैं। वे हमसे ऐसे बर्ताव कर रहे हैं जैसे हम इस देश के नहीं हैं।”

बब्बन ने कहा, “हमारे मकान मालिक ने हमें बाहर नहीं निकाला। उन्होंने कहा कि लॉकडाउन समाप्त होने तक हम यहां रह सकते हैं। लेकिन इसमें कितना वक्त लगेगा यह कोई नहीं जानता। हमारे परिवार वाले चाहते हैं कि हम घर आ जाएं। मैंने अपनी नवजात बच्ची को अभी तक नहीं देखा है।”

बब्बन की पत्नी परेशान है और उन्हें चार बार कॉल कर चुकी है।

एक अन्य प्रवासी श्रमिक मोहम्मद परवेज ने पुलिसकर्मी के सामने हाथ जोड़कर कहा, “हमें आश्रय गृह में ले चलो। हम चिकित्सा जांच कराने को तैयार हैं। प्लीज सर जी।”

मधुबनी जिले के रहने वाले 28 वर्षीय श्रमिक ने कहा, “प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अचानक लॉकडाउन की घोषणा कर दी और हम यहां फंस गए। मैं यह नहीं कहता कि लॉकडाउन की जरूरत नहीं है, लेकिन सरकार को पहले हमारे लिए बंदोबस्त करना चाहिए था।”

सोमवार रात से केवल केले और बिस्कुट खाकर पेट भर रहे परवेज ने कहा कि उनके राज्य के कुछ लोग वापस जाने के लिए पैदल ही निकल पड़े थे लेकिन पुलिस ने लाठी मारकर उन्हें लौटा दिया।

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