देश की खबरें | उच्च न्यायालय के फैसलों में दी गई 'यौन हमले' की व्याख्या त्रुटिपूर्ण है: पूर्व मुख्य न्यायाधीश

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. बंबई उच्च न्यायालय द्वारा बीते एक सप्ताह के दौरान सुनाए गए दो फैसलों को लेकर आक्रोश फैला हुआ है। कानून विशेषज्ञों ने दोनों ही मामलों में ''यौन हमला'' शब्द की न्यायाधीश द्वारा संकीर्ण व्याख्या पर सवाल उठाए हैं।

मुंबई, 28 जनवरी बंबई उच्च न्यायालय द्वारा बीते एक सप्ताह के दौरान सुनाए गए दो फैसलों को लेकर आक्रोश फैला हुआ है। कानून विशेषज्ञों ने दोनों ही मामलों में ''यौन हमला'' शब्द की न्यायाधीश द्वारा संकीर्ण व्याख्या पर सवाल उठाए हैं।

इनमें से 19 जनवरी के एक फैसले पर बुधवार को उच्चतम न्यायालय ने रोक लगा दी थी।

उच्च न्यायालय के एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश ने दोनों फैसलों को ''त्रुटिपूर्ण'' करार दिया तो वहीं एक और सेवानिवृत न्यायाधीश ने चिंता जतायी कि इससे गलत कानूनी मिसाल कायम हो सकती हैं।

गौरतलब है कि 19 जनवरी को उच्च न्यायालय की नागपुर पीठ की न्यायमूर्ति पुष्पा गणेडिवाला ने कहा था किसी हरकत को पॉक्सो अधिनियम के तहत यौन हमला मानने के लिये यौन इच्छा के साथ स्पर्श करना जरूरी है।

उससे चार दिन पहले उन्हीं न्यायाधीश ने कहा था कि एक व्यक्ति द्वारा पांच वर्षीय लड़की का हाथ पकड़ना और अपनी पैंट की चेन खोलना यौन हमला नहीं है।

न्यायमूर्ति गणेडिवाला ने 15 जनवरी के फैसले में लिबनस कुजुर (50) को पांच वर्षीय लड़की पर यौन हमले के आरोप से मुक्त कर दिया था। हालांकि अदालत ने महिला/लड़की की गरिमा को ठेस पहुंचाने के लिये भारतीय दंड संहिता के तहत के उसकी सजा को बरकरार रखा था।

बंबई उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश प्रदीप नंदराजोग ने इन फैसलों की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि दोनों फैसले ''गलत और त्रुटिपूर्ण'' हैं।

उन्होंने कहा, ''ऐसे मामलों में अदालतों को खासतौर पर आरोपी की मंशा देखने की जरूरत है। गलत तरीके से छूना या यौन इरादे से कोई हरकत करना पॉक्सो अधिनियम के प्रावधानों के तहत आता है। ''

सेवानिवृत न्यायाधीश ने कहा कि जब यौन हमला करने का इरादा हो तो स्पर्श करना, हाथ पकड़ना या पैंट की चेन खोलना कोई मायने नहीं रखता।

न्यायमूर्ति नंदराजोग ने कहा, ''इससे अधिक चिंता की बात यह है कि यह फैसले एक महिला न्यायाधीश ने दिये। हम निचली अदालतों में इस कानून के तहत ऐसे मामलों की सुनवाई के लिये महिला न्यायाधीशों और कर्मचारियों को नियुक्त करते हैं क्योंकि वे पीड़ित लड़की को समझने और उससे बात करने के लिये बेहतर स्थिति में होते हैं।''

बंबई उच्च न्यायालय के ही एक और सेवानिवृत न्यायाधीश अभय थिपसे ने भी फैसलों को त्रुटिपूर्ण करार दिया।

उन्होंने 'पीटीआई-' से कहा , ''अगर न्यायाधीश ऐसे किसी विशिष्ट निष्कर्ष पर पहुंचते हैं तो उन्हें इसके ठोस तर्क देने चाहिये।''

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