जरुरी जानकारी | खाद्य तेल- तिलहन कीमतों में बीते सप्ताह दिखा मिला-जुला रुख

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on Information at LatestLY हिन्दी. बीते सप्ताह दिल्ली तेल-तिलहन बाजार में खाद्य तेल तिलहन कीमतों में मिला-जुला रुख दिखाई दिया। जहां सरसों तेल- तिलहन और सोयाबीन दाना एवं लूज के भाव गिरावट पर बंद हुए वहीं सोयाबीन तेल, मूंगफली तेल तिलहन, पामोलीन और बिनौला तेल कीमतों में मजबूती देखी गई। रिफाइंड में महंगा बैठने के बावजूद सस्ते में उपलब्ध कच्चा पामतेल (सीपीओ) की मांग होने से सीपीओ के भाव पूर्वस्तर पर बने रहे।

नयी दिल्ली, 18 दिसंबर बीते सप्ताह दिल्ली तेल-तिलहन बाजार में खाद्य तेल तिलहन कीमतों में मिला-जुला रुख दिखाई दिया। जहां सरसों तेल- तिलहन और सोयाबीन दाना एवं लूज के भाव गिरावट पर बंद हुए वहीं सोयाबीन तेल, मूंगफली तेल तिलहन, पामोलीन और बिनौला तेल कीमतों में मजबूती देखी गई। रिफाइंड में महंगा बैठने के बावजूद सस्ते में उपलब्ध कच्चा पामतेल (सीपीओ) की मांग होने से सीपीओ के भाव पूर्वस्तर पर बने रहे।

बाजार के जानकार सूत्रों ने कहा कि आयातित तेलों के ऊंचे भाव बोले जा रहे हैं लेकिन उस भाव पर लिवाल नहीं हैं। भाव ऊंचा बोले जाने की वजह से सोयाबीन तेल, मूंगफली तेल तिलहन, पामोलीन और बिनौला तेल कीमतों में मजबूती आई है।

सूत्रों के मुताबिक, सरसों सहित सोयाबीन, मूंगफली, बिनौला जैसे देशी तेल तिलहनों की पेराई में मिल मालिकों को नुकसान है। सस्ते आयातित तेलों की वजह से संकट और बढ़ गया है क्योंकि उनके मुकाबले देशी तेल तिलहनों के भाव टिक नहीं पा रहे हैं या फिर उनके लिवाल कम हैं। ऐसी स्थिति में मजबूरी में थोक बाजार में देशी तेलों को सस्ते में बेचना पड़ रहा है। जबकि अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) जरुरत से कहीं बढ़ाकर रखे जाने से खुदरा बाजार में उपभोक्ताओं को ऊंचे दामों पर खरीदना पड़ रहा है।

सूत्रों ने कहा कि कच्चा पामतेल और पामोलीन तेल के आयात शुल्क का अंतर और बढ़ाने की तेल संगठनों की मांग जायज है क्योंकि इससे घरेलू तेल रिफायनिंग उद्योग का कामकाज चलेगा। हालांकि इन संगठनों को सस्ते आयातित तेलों की भरमार के कारण देश के छोटे-बड़े सभी किस्म के तेल उद्योग की बदहाली के बारे में भी सरकार को बताना चाहिये। कोटा प्रणाली इन तेल उद्योगों की कमर तोड़ रही है लिहाजा संगठनों को कोटा व्यवस्था खत्म की सलाह सरकार को देनी चाहिए।

सूत्रों का कहना है कि तेल आयात पर भारी मात्रा में होने वाले विदेशीमुद्रा खर्च को देखते हुए तेल तिलहन कारोबार को सट्टेबाजी से मुक्त रखना अहम है और इस क्रम में तेल तिलहनों के वायदा कारोबार पर रोक जारी रखना जरूरी है। सूत्रों ने कहा कि बिनौला खल के वायदा कारोबार को भी रोक देना चाहिये क्योंकि सट्टेबाज किसानों से नीचे भाव में खरीद कर बाद में भाव ऊंचा कर देते हैं और किसानों की लूट होती है। इसी वजह से दूध के दाम पिछले कुछ महीनों में निरंतर बढ़े हैं और आगे भी दूध के दाम में वृद्धि होने की सुगबुगाहट है। वायदा कारोबार में बिनौला खल के भाव तीन चार माह के दौरान 26 प्रतिशत बढ़ गये हैं जिससे दूध लगभग 10 प्रतिशत महंगा हो गया है।

सूत्रों ने कहा कि पेराई में नुकसान होने के कारण सोयाबीन तेल के भाव ऊंचे बोले जाने से सोयाबीन तेल कीमतों में सुधार आया है। दूसरी ओर सस्ते आयातित सोयाबीन तेल के कारण देशी सोयाबीन तिलहन की मांग प्रभावित होने से सोयाबीन तिलहन में गिरावट रही।

सूत्रों ने कहा कि उक्त स्थिति के कारण ही पहली बार हमें डी-आयल्ड केक (डीओसी) का आयात करना पड़ा जिसका खामियाजा मौजूदा वक्त में भी भुगतना पड़ रहा है। सोयाबीन का जमा स्टॉक बाजार में खप नहीं रहा।

सूत्रों ने कहा कि विदेशों में सूरजमुखी और सोयाबीन तेल के दाम में पिछले छह माह के दौरान 70-90 रुपये किलो की गिरावट आई है। इन खाद्यतेलों की खपत संभ्रांत तबके में अधिक होती है और इनका पाम एवं पामोलीन के मुकाबले आयात भी कम होता है। अधिक आयात पाम और पामोलीन तेल का होता है जो हमारे देशी तेल तिलहनों पर अधिक असर नहीं डालते। इन खाद्यतेलों को कमजोर आयवर्ग के लोग और बिस्कुट बनाने जैसे उद्योगों में कहीं अधिक होता है। विशेषज्ञों का मानना है कि विशेष रूप से पाम एवं पामोलीन तेलों के सस्ता होने से भी देश की मुद्रास्फीति कम हुई है।

समीक्षाधीन सप्ताह में सीपीओ के प्रसंस्करण के खर्च बढ़ने से पामोलीन में सुधार आया है लेकिन भाव अभी भी काफी कम बने हुए हैं जो चार-पांच माह पूर्व के भाव के मुकाबले लगभग आधे हैं। मांग होने के बावजूद रिफायनिंग खर्च के कारण सीपीओ के दाम पूर्वस्तर पर बंद हुए।

सूत्रों ने कहा कि किसानों द्वारा नीचे भाव में बिकवाली नहीं करने और उपभोक्ता मांग बढ़ने के कारण मूंगफली तेल- तिलहन कीमतों में सुधार आया।

सूत्रों ने कहा कि इस वर्ष मंडियों में बिनौला, कपास नरमा की आवक घटकर लगभग आधी रह गई है जिससे बिनौला तेल कीमतों में सुधार आया। गौरतलब है कि पशु आहार के लिए सबसे अधिक यानी लगभग 110 लाख टन खल बिनौले से मिलती है।

सूत्रों के मुताबिक, पिछले सप्ताहांत के मुकाबले बीते सप्ताह सरसों दाने का भाव 65 रुपये घटकर 7,010-7,060 रुपये प्रति क्विंटल पर बंद हुआ। सरसों दादरी तेल भी समीक्षाधीन सप्ताहांत में 100 रुपये घटकर 13,950 रुपये प्रति क्विंटल पर बंद हुआ। वहीं सरसों पक्की घानी और कच्ची घानी तेल की कीमतें भी क्रमश: 10-10 रुपये घटकर क्रमश: 2,120-2,250 रुपये और 2,180-2,305 रुपये टिन (15 किलो) पर बंद हुईं।

सूत्रों ने कहा कि समीक्षाधीन सप्ताह में सोयाबीन दाने और लूज के थोक भाव क्रमश: 25-25 रुपये की गिरावट के साथ क्रमश: 5,525-5,625 रुपये और 5,335-5,385 रुपये प्रति क्विंटल पर बंद हुए।

दूसरी ओर समीक्षाधीन सप्ताहांत में सोयाबीन दिल्ली, सोयाबीन इंदौर और सोयाबीन डीगम तेल क्रमश: 200 रुपये, 50 रुपये और 300 रुपये लाभ के साथ क्रमश: 13,100 रुपये, 12,900 रुपये और 11,450 रुपये प्रति क्विंटल पर बंद हुआ।

किसानों के कम भाव में बिकवाली नहीं करने और पेराई लागत के कारण समीक्षाधीन सप्ताह में मूंगफली तेल-तिलहनों कीमतों में सुधार देखने को मिला। समीक्षाधीन सप्ताहांत में मूंगफली तिलहन का भाव 25 रुपये बढ़कर 6,435-6,495 रुपये प्रति क्विंटल पर बंद हुआ। पूर्व सप्ताहांत के बंद भाव के मुकाबले समीक्षाधीन सप्ताह में मूंगफली तेल गुजरात 100 रुपये बढ़कर 15,100 रुपये प्रति क्विंटल पर बंद हुआ जबकि मूंगफली साल्वेंट रिफाइंड का भाव 15 रुपये बढ़कर 2,430-2,695 रुपये प्रति टिन पर बंद हुआ।

सूत्रों ने कहा कि समीक्षाधीन सप्ताह में कच्चे पाम तेल (सीपीओ) का भाव 8,500 रुपये पर पूर्ववत बना रहा। जबकि पामोलीन दिल्ली का भाव 50 रुपये बढ़कर 10,050 रुपये हो गया। पामोलीन कांडला का भाव 150 रुपये बढ़कर 9,150 रुपये प्रति क्विंटल पर बंद हुआ।

मंडियों में बिनौला, कपास नरमा की आवक लगभग आधी रह जाने से समीक्षाधीन सप्ताह में बिनौला तेल भी 50 रुपये बढ़कर 11,500 रुपये प्रति क्विंटल पर बंद हुआ।

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