देश की खबरें | कोविड से लड़ाई के दौरान कई दिनों तक परिवार से नहीं मिले, निजी जिंदगी खत्म हुई: डॉक्टर

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. कोविड-19 महामारी के जबर्दस्त प्रकोप की वजह से डॉक्टरों पर अत्याधिक दबाव पड़ा है और उन्हें संक्रमित मरीजों की जान बचाने के लिए दिन-रात जुटे रहना पड़ा जिस वजह से वे कई दिनों तक अपने परिवारों से नहीं मिल सके और उनकी निजी जिंदगी करीब-करीब खत्म हो ही गई। कुछ डॉक्टरों को मानसिक पीड़ा से भी गुजरना पड़ा है और उन्हें मनोचिकित्सक से स्वयं को दिखाना पड़ा है।

नयी दिल्ली, एक जुलाई कोविड-19 महामारी के जबर्दस्त प्रकोप की वजह से डॉक्टरों पर अत्याधिक दबाव पड़ा है और उन्हें संक्रमित मरीजों की जान बचाने के लिए दिन-रात जुटे रहना पड़ा जिस वजह से वे कई दिनों तक अपने परिवारों से नहीं मिल सके और उनकी निजी जिंदगी करीब-करीब खत्म हो ही गई। कुछ डॉक्टरों को मानसिक पीड़ा से भी गुजरना पड़ा है और उन्हें मनोचिकित्सक से स्वयं को दिखाना पड़ा है।

राष्ट्रीय चिकित्सक दिवस पर अग्रिम पंक्ति के इन योद्धाओ ने अपने अनुभवों को साझा किया और बताया कि ये उनकी जिंदगी में सबसे खराब हालात थे।

गुड़गांव में फोर्टिस मेमोरियल रिसर्च इंस्ट्टियूट में संक्रामक रोग परामर्शदाता नेहा रस्तोगी पांडा ने बताया कि उनके पिता दिल्ली के रोहिणी इलाके में रहते हैं और उच्च रक्तचाप से पीड़ित हैं, जिस वजह से वह उनसे दो महीने तक मिल नहीं सकीं थी। उनकी मां का दो साल पहले देहांत हो गया था और उन्होंने ओडिशा में रहने वाली अपनी सास को एक साल से ज्यादा समय से देखा नहीं है।

उन्होंने कहा, “(कोरोना वायरस की) दूसरी लहर के चरम पर पहुंचने के दौरान, मुझे और मेरे पति जो एक प्रयोगशाला में काम करते हैं, को परिवार के सदस्यों, हमारे प्रियजनों के लिए मुश्किल से ही समय मिला होगा। हमारी उनसे 10 संकेड की बात होती थी और मैं कहती थी कि ठीक हूं और पूछती थी कि क्या वे ठीक हैं।”

उन्होंने कहा, “ हम मरीजों के लिए हमेशा उपलब्ध रहे, चाहे फोन पर या व्यक्तिगत तौर पर। बीते डेढ़ साल से कोई निजी जिंदगी नहीं बची है। ज्यादातर समय मैं काम पर होती हूं या फिर मेरे पति काम पर होते हैं। हम इस दौरान घर पर एकसाथ नहीं रहे।”

रोहिणी स्थित धर्मवीर सोलंकी अस्पताल के डॉक्टर पंकज सोलंकी ने बताया कि पिछले साल जब लॉकडाउन का ऐलान किया गया तो वह और उनकी डॉक्टर पत्नी अपना सामान बांधकर अस्पताल में ही शिफ्ट हो गए और पिछले साल जुलाई में जब मामले कम हुए तो घर वापस गए।

उन्होंने कहा कि उनका पांच साल का बच्चा है जो आम तौर पर अपने माता-पिता से नहीं मिल पाता है और उनकी मां तथा सास उसका ध्यान रखती हैं।

कोविड की दूसरी लहर के दौरान जब दिल्ली अप्रत्याशित ऑक्सीजन संकट से जूझ रही थी तब डॉक्टर सोलंकी 10 दिन में सिर्फ ’20 घंटे’ सो पाए।

उन्होंने कहा, “ हमने अस्पताल को अपना घर बना लिया। मैं ऑक्सीजन का इंतज़ाम करने के लिए यहां वहां भागता रहा। मैं बहुत तनाव में था। कुछ बार तो मैं अपने कर्मियों पर चिल्ला दिया करता था। यह दुस्वप्न था। मैं मानसिक तौर पर परेशान हो गया था। मैं बीते पांच-छह सप्ताह से मनोचिकित्सक से परामर्श ले रहा हूं।”

दिल्ली के सरकारी लोकनायक जयप्रकाश अस्पताल के चिकित्सा निदेशक सुरेश कुमार ने पिछले साल फरवरी से कोई छुट्टी नहीं ली।

उन्होंने कहा, “ मैं और मेरे सहकर्मी लगातार काम कर रहे हैं। यह हमारे लिए एक चुनौतीपूर्ण समय है। मेरे पिता और मेरी पत्नी समेत मेरे परिवार के कई सदस्य कोविड-19 के संपर्क में आए।”

बत्रा अस्पताल में कोविड की दूसरी लहर के दौरान कथित रूप से ऑक्सीजन की कमी के कारण एक डॉक्टर समेत 11 रोगियों की मौत हो गई थी। बत्रा अस्पताल के चिकित्सा निदेशक डॉ एससीएल गुप्ता ने इसे अपने जीवन का सबसे बुरा अनुभव बताया, क्योंकि व्यक्ति उन चीजों के लिए लाचार था जो उसके हाथ नहीं थी।

उन्होंने कहा, ‘‘ डॉक्टरों को बिना हथियार के ही जंग के मैदान में उतार दिया गया। दवाइयों, बिस्तरों और ऑक्सीजन की कमी थी। हमने बहुत मेहनत से काम किया।”

द्वारका स्थित आकाश हेल्थकेयर में श्वास-रोग विशेषज्ञ डॉ अक्षय बुधराजा ने बताया कि जबलपुर में रहने वाले उनके माता-पिता को जब पता चला कि वह कोविड से संक्रमित रोगियों का उपचार कर रहे हैं तो वह चिंतित हुए और डर गए।

कोविड की दूसरी लहर के बारे में बात करते हुए उन्होंने कहा कि हर दिन एक नयी चुनौती देकर आया।” उन्होंने कहा, “ आईसीयू में भर्ती जिन मरीजों को देखकर लग रहा था कि उनकी मौत होने वाली है, किंतु वे चमत्कार रूप से ठीक हो गए और जो मरीज बिल्कुल ठीक थे, अचानक से उनकी हालत बिगड़ गई।”

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