देश की खबरें | दिव्यांग छात्रों के लिये परीक्षा कराने में तैयारी की कमी पर अदालत ने डीयू से पूछा सवाल

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. दिल्ली उच्च न्यायालय ने स्नातक अंतिम वर्ष की खुली पुस्तक परीक्षा (ओबीई) में दिव्यांग छात्रों के लिये लिखने वालों व सीएसई केंद्रों की व्यवस्था समेत अन्य सुविधाओं और तैयारियों में कमी को लेकर मंगलवार को दिल्ली विश्वविद्यालय से सवाल पूछा।

एनडीआरएफ/प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credits: ANI)

नयी दिल्ली, 28 जुलाई दिल्ली उच्च न्यायालय ने स्नातक अंतिम वर्ष की खुली पुस्तक परीक्षा (ओबीई) में दिव्यांग छात्रों के लिये लिखने वालों व सीएसई केंद्रों की व्यवस्था समेत अन्य सुविधाओं और तैयारियों में कमी को लेकर मंगलवार को दिल्ली विश्वविद्यालय से सवाल पूछा।

उच्च न्यायालय ने यह जानना चाहा कि साझा सेवा (सीएसई) केंद्र के जरिये परीक्षा में हिस्सा लेने के लिये कितने दिव्यांग श्रेणी के छात्रों ने आवेदन किया है। इन केंद्रों को उन छात्रों की सुविधा के लिये स्थापित किया गया है जिनके पास खुली पुस्तक परीक्षा देने के लिये आधारभूत व्यवस्था नहीं है।

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विश्वद्यालय हालांकि इस सवाल का जवाब नहीं दे पाया और उसने विवरण हासिल करने के लिये वक्त की मांग की।

न्यायमूर्ति हिमा कोहली और सुब्रमण्यम प्रसाद की पीठ ने कहा, “दिव्यांग छात्रों के करियर को लेकर आप इसी तरह चिंतित हैं जिन्हें अंतिम वर्ष की परीक्षा में बैठना है। शुक्र है यूजीसी के खुद के दिशानिर्देशों का, जिसने अंतिम वर्ष के छात्रों की परीक्षा लिये जाने को अनिवार्य बनाया। हमें पता है कि यूजीसी के दिशानिर्देश को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी गई है। लेकिन हम निश्चित रूप से परीक्षा की तैयारियों को लेकर सवाल पूछेंगे।”

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उच्च न्यायालय विधि के छात्र प्रतीक शर्मा और नेशनल फेडरेशन ऑफ द ब्लाइंड द्वारा दायर याचिका पर उच्च न्यायालय सुनवाई कर रहा था। याचिका में मांग की गई है कि दृष्टिबाधित और दिव्यांग छात्रों के लिए एक प्रभावी तंत्र बनाया जाए जिससे शैक्षणिक निर्देश उन तक सुचारू रूप से पहुंच पाएं और कोविड-19 महामारी के दौरान शिक्षण के डिजिटल माध्यम के जरिये उन्हें शिक्षण सामग्री उपलब्ध कराई जाए।

न्यायमूर्ति कोहली ने विश्वविद्यालय से पूछा, “मुझे विश्वास है कि डीयू इस तथ्य को समझता है कि छात्रों का करियर दांव पर है, आप इतने सुस्त कैसे हो सकते हैं।”

अदालत ने यह भी जानना चाहा कि क्या याचिकाकर्ताओं का यह दावा सच है कि दिव्यांग छात्रों को पठन सामग्री, सहायक उपकरण और लिखने वाला नहीं दिया जा रहा है।

अदालत ने कहा कि मानव संसाधन विकास मंत्रालय और इलेक्ट्रॉनिक्स एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय को पूर्व में सीएसई सेंटरों और लिखने वालों की उपलब्धता समेत उनकी तैयारियों पर हलफनामा दायर करने को कहा गया था।

पीठ ने कहा, इलेक्ट्रॉनिक्स एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय द्वारा दायर हलफनामे में हालांकि ऐसे सीएसई केंद्रों की संख्या नहीं बताई गई है जो चालू नहीं हैं। अदालत ने कहा कि केंद्रों पर आधारभूत सुविधाओं के न होने के मुद्दे को भी सुलझाना है।

निर्देश के बावजूद डीयू ने इस मुद्दे पर अपना हलफनामा दायर नहीं किया है तथा और वक्त की मांग की है।

शर्मा की तरफ से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा कि विश्वविद्यालय के दिशानिर्देश के मुताबिक छात्र को परीक्षा से पहले लिखने वाला उपलब्ध कराया जाता है जिससे वह उसकी उपयुक्तता परख सके, इस पर संज्ञान लेते हुए अदालत ने कहा “हमारे लिये यह जानना जरूरी है कि क्या लिखने वाले की मांग करने वाले छात्र को परीक्षा से दो दिन पहले उससे बात करने की सुविधा मिल पाएगी?”

सिब्बल ने कहा कि बहुत से छात्र सुदूरवर्ती इलाकों में रहते हैं और वहां सीएसई केंद्र नहीं है तथा इसलिये अदालत के समक्ष सीएसई अकादमी की उपस्थिति महत्वपूर्ण है जिससे इन केंद्रों की उपलब्धता और साजो-सामान के बारे में पता चल सके।

अदालत ने सीएसई अकादमी के प्रतिनिधियों से 30 जुलाई को उसके समक्ष पेश होने को कहा है, जिससे यह जाना जा सके कि देश भर में शहरी और ग्रामीण इलाकों में कितने केंद्र हैं।

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