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सेवा मामलों के निस्तारण को लेकर इतने सशंकित न रहें: कैट अध्यक्ष ने जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट से कहा

जम्मू कश्मीर उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति गीता मित्तल के दावों को खारिज करते हुए कर्मचारियों के सेवा मामलों को संभालने की अधिकरण की क्षमता के संदर्भ में केंद्र को लिखे एक पत्र में रेड्डी ने कहा कि पिछले कुछ महीनों में अधिकरण में मामलों के निस्तारण की दर 104 प्रतिशत रही है।

सेवा मामलों के निस्तारण को लेकर इतने सशंकित न रहें: कैट अध्यक्ष ने जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट से कहा
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नयी दिल्ली, 16 मई जम्मू कश्मीर उच्च न्यायालय को केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (कैट) द्वारा मामलों के निस्तारण के बारे में इतना सशंकित नहीं होना चाहिए। कैट के अध्यक्ष एल नरसिम्हा रेड्डी ने शनिवार को यह बात कही।

जम्मू कश्मीर उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति गीता मित्तल के दावों को खारिज करते हुए कर्मचारियों के सेवा मामलों को संभालने की अधिकरण की क्षमता के संदर्भ में केंद्र को लिखे एक पत्र में रेड्डी ने कहा कि पिछले कुछ महीनों में अधिकरण में मामलों के निस्तारण की दर 104 प्रतिशत रही है।

रेड्डी ने कहा कि पत्र की सामग्री—जो कार्मिक मामलों के राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह को नहीं मिला- प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में आ चुकी है।

कैट अध्यक्ष ने कहा, “विभिन्न स्थानों पर पीठों की स्थापना और मामलों का निस्तारण सुनिश्चित करना अधिकरण की जिम्मेदारी है और उच्च न्यायालय को इसे लेकर इतना सशंकित होने की जरूरत नहीं है। जहां कहीं भी जरूरत होगी, उच्च न्यायालय का निर्देशन और मदद अवश्य ली जाएगी।”

मीडिया में आई खबरों के संदर्भ में उन्होंने कहा कि खबरों में आने वाले कई बयानों की “वास्तव में जरूरत नहीं थी और किसी भी रूप में वो उच्च न्यायालय के लिये चिंता का विषय नहीं थे।”

मित्तल और रेड्डी के दावे केंद्र सरकार द्वारा 29 अप्रैल को जारी उस आदेश की पृष्ठभूमि में आए जिसमें उल्लेख था कि कैट की चंडीगढ़ पीठ के न्यायक्षेत्र में हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और पंजाब तथा केंद्र शासित क्षेत्र चंडीगढ़,जम्मू-कश्मीर और लद्दाख की पीठ आती हैं।

पूर्ववर्ती राज्य जम्मू कश्मीर को 31 अक्टूबर 2019 को दो केंद्र शासित क्षेत्रों- जम्मू-कश्मीर और लद्दाख- के तौर पर पुनर्गठित किया गया था। उसके कर्मचारी जो पूर्व में राज्य सरकार के न्यायक्षेत्र में आते थे अब कैट के दायरे में आते हैं।

कैट अध्यक्ष ने कहा, “अगर 31,000 सेवा मामले उच्च न्यायालय के समक्ष लंबित हैं और याचिकाकर्ता कई सालों से इंतजार कर रहे हैं तो यह अधिकरण की किसी चूक की वजह से नहीं है।”

रेड्डी ने कहा कि कोई अधिकरण की पीठ के एक झटके में पूर्ण रूप से काम शुरू कर देने की उम्मीद नहीं कर सकता वह भी तब, जब उच्च न्यायालय से मामलों का स्थानांतरण अभी नहीं हुआ है।

उन्होंने कहा, “मैं यहां उल्लेख कर सकता हूं कि राज्य के पुनर्गठन से पहले जम्मू और श्रीनगर स्थित पीठों में सिर्फ 140 मामले लंबित थे।”

केंद्र सरकार के कर्मचारियों के सेवा संबंधी मामलों को देखने वाले अधिकरण की देश भर में 33 पीठ हैं।

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(The above story first appeared on LatestLY on May 16, 2020 05:15 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).