देश की खबरें | अनुशासनात्मक कार्यवाही में सिर्फ संभावनाओं की प्रबलता दिखाने की जरूरत : न्यायालय

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि सरकारी नियोक्ताओं को दोषी कर्मचारी को बर्खास्त करने के लिए अनुशासनात्मक कार्यवाही के दौरान कदाचार साबित करने के लिए केवल “संभावनाओं की प्रबलता” दिखाने की आवश्यकता है, जो कि आपराधिक मुकदमों में आवश्यक “उचित संदेह से परे” मानक से कम कठोर पैमाना है।

नयी दिल्ली, पांच फरवरी उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि सरकारी नियोक्ताओं को दोषी कर्मचारी को बर्खास्त करने के लिए अनुशासनात्मक कार्यवाही के दौरान कदाचार साबित करने के लिए केवल “संभावनाओं की प्रबलता” दिखाने की आवश्यकता है, जो कि आपराधिक मुकदमों में आवश्यक “उचित संदेह से परे” मानक से कम कठोर पैमाना है।

न्यायमूर्ति जेके माहेश्वरी और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने चार फरवरी को पारित आदेश में कलकत्ता उच्च न्यायालय के मार्च 2012 के एक फैसले को रद्द कर दिया, जिसके तहत भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण (एएआई) के पूर्व सहायक अभियंता (सिविल) प्रदीप कुमार बनर्जी की बर्खास्तगी को पलट दिया गया था।

शीर्ष अदालत ने संबंधित आपराधिक मामले में बरी किए जाने के बावजूद एएआई के पूर्व इंजीनियर की बर्खास्तगी को बरकरार रखा। न्यायालय ने कहा कि आपराधिक मुकदमों के विपरीत, जिनमें मामलों को उचित संदेह से परे साबित करना होता है, संबंधित अनुशासनात्मक जांच में पैमाना सीमित था।

यह फैसला सरकारी नियोक्ताओं के लिए एक महत्वपूर्ण हथियार साबित हो सकता है, जो अनुशासनात्मक कार्यवाही के तहत कदाचार के दोषी कर्मचारियों को सेवा से बर्खास्त कर सकते हैं, फिर चाहे संबंधित आपराधिक मामलों में उन्हें बरी ही क्यों न कर दिया गया हो।

सर्वोच्च अदालत ने एएआई के हक में फैसला सुनाते हुए कहा कि बनर्जी के खिलाफ की गई अनुशासनात्मक कार्रवाई जायज थी।

न्यायमूर्ति मेहता की ओर से लिखे गए 28 पन्ने के फैसले में कहा गया है, “कानून का यह स्थापित सिद्धांत है कि आपराधिक मुकदमे में अभियोजन पक्ष पर मामले को उचित संदेह से परे साबित करने का बोझ होता है। हालांकि, अनुशासनात्मक जांच में विभाग पर सीमित बोझ रहता है और उसे संभावनाओं की प्रबलता के सिद्धांत पर अपना मामला साबित करना होता है।”

न्यायालय ने कहा कि उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने “आपराधिक मुकदमे में आवश्यक सबूत के मानक को नियोक्ता की ओर से की गई अनुशासनात्मक जांच में लागू करने की गंभीर त्रुटि की।”

बनर्जी को एक ठेकेदार के प्रतिनिधि से रिश्वत लेने के आरोप में उनके एक सहकर्मी (एएआई के एक कनिष्ठ अभियंता) के साथ गिरफ्तार किया गया था।

केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) ने आरोपियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत प्राथमिकी दर्ज की थी, जिसके बाद एक विशेष अदालत ने बनर्जी को दोषी ठहराया था और कनिष्ठ अभियंता को बरी कर दिया था।

अनुशासनात्मक प्राधिकारी ने बनर्जी को उनकी सजा के आधार पर 13 जुलाई 2000 को सेवा से बर्खास्त कर दिया था।

एक मार्च 2012 को कलकत्ता उच्च न्यायालय ने बनर्जी की बर्खास्तगी के फैसले को पलट दिया था, जिसके खिलाफ एएआई ने शीर्ष अदालत का रुख किया था।

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