नयी दिल्ली, 30 मई दिल्ली उच्च न्यायालय ने मंगलवार को तृणमूल कांग्रेस के नेता अनुब्रत मंडल की उस याचिका पर प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) से जवाब मांगा जिसमें दावा किया गया कि पश्चिम बंगाल में पशु तस्करी से जुड़े धनशोधन के एक मामले में जेल में उनकी हिरासत अवैध है।
मंडल के वकील ने दलील दी कि उन्हें न्यायिक हिरासत में भेजने का कोई वैध न्यायिक आदेश नहीं था।
न्यायमूर्ति सिद्धार्थ मृदुल और न्यायमूर्ति तलवंत सिंह की पीठ ने मंडल की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर नोटिस जारी किया और उनके वकीलों से कहा कि पहले यह दिखाएं कि याचिका सुनवाई योग्य है। पीठ ने याचिका पर अपना जवाब दाखिल करने के लिए जांच एजेंसी को पांच कार्य दिवस का समय दिया और मामले को नौ जून के लिए सूचीबद्ध किया।
ईडी के वकील अनुपम एस शर्मा ने कहा कि आरोपी की न्यायिक हिरासत वैध थी और निचली अदालत के न्यायाधीश द्वारा हस्ताक्षरित हिरासत वारंट के अनुसार थी, और इसलिए मंडल की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका सुनवाई योग्य नहीं है।
मंडल की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता दयान कृष्णन ने दलील दी कि अगर हिरासत अवैध थी तो बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका उच्च न्यायालय में सुनवाई योग्य है । बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका एक ऐसे व्यक्ति को अदालत में पेश करने के लिए दायर की जाती है जो अवैध हिरासत या गैरकानूनी हिरासत में है।
वकील मुदित जैन के माध्यम से दायर अपनी याचिका में, पश्चिम बंगाल की सत्तारूढ़ पार्टी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के बीरभूम जिला प्रमुख ने कहा कि जब उन्हें 8 मई को निचली अदालत में पेश किया गया था, तो उन्हें विशेष रूप से न्यायिक हिरासत में नहीं भेजा गया बल्कि तिहाड़ जेल ले जाया गया।
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के करीबी माने जाने वाले मंडल ने याचिका में कहा है कि 12 जुलाई को सुनवाई की अगली तारीख तय की गई थी, जिससे उनकी न्यायिक हिरासत कानूनी रूप से अधिकतम 15 दिन की अवधि से आगे बढ़ गई।
मंडल को केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) ने इस मामले में पिछले साल 11 अगस्त को गिरफ्तार किया था। उन्हें ईडी ने पिछले साल 17 नवंबर को गिरफ्तार किया था और 8 मार्च से 14 दिन के लिए धन शोधन रोधी जांच एजेंसी की हिरासत में भेज दिया गया था।
ईडी के मुताबिक, सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के तत्कालीन कमांडेंट सतीश कुमार के खिलाफ कोलकाता में सीबीआई द्वारा प्राथमिकी दर्ज करने के बाद उसने धन शोधन का मामला दर्ज किया।
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