देश की खबरें | दिल्ली सरकार पशु चिकित्सा कर्मियों के कौशल विकास के लिए निवेश कर रही है: उच्च न्यायालय

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा है कि दिल्ली सरकार पशुओं की तत्काल स्वास्थ्य देखभाल जरूरतों पर गौर कर रही है और एक कॉलेज का निर्माण करा कर पशु चिकित्सा कर्मियों के प्रशिक्षण और कौशल विकास के लिए भी निवेश कर रही है।

नयी दिल्ली, सात सितंबर दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा है कि दिल्ली सरकार पशुओं की तत्काल स्वास्थ्य देखभाल जरूरतों पर गौर कर रही है और एक कॉलेज का निर्माण करा कर पशु चिकित्सा कर्मियों के प्रशिक्षण और कौशल विकास के लिए भी निवेश कर रही है।

उच्च न्यायालय ने कहा कि दिल्ली सरकार पशुओं में कैनाइन डिस्टेंपर (सीडी) वायरस और पैरावायरस के खतरों से अनजान नहीं है और पशुओं को इनसे बचाने के लिए टीके लगाए जा रहे हैं।

मुख्य न्यायाधीश सतीश चंद्र शर्मा और न्यायमूर्ति संजीव नरूला की पीठ ने कहा कि पशुओं का कल्याण संविधान में निर्धारित राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांत के अनुरूप बेहतरीन कार्य है। हालांकि टीकों की उपलब्धता निर्धारित करने का निर्णय पशु चिकित्सा विशेषज्ञों के पास होनी चाहिए।

अदालत ने यह आदेश राहुल मोहोद की ओर से दाखिल याचिका पर दिया, जिसके पालतू कुत्ते की मौत 2019 में सीडी वायरस के कारण हो गई थी।

याचिकाकर्ता ने कहा कि कैनाइन डीएचपीपीआई वैक्सीन (डिस्टेंपर कंबाइंड 9-इन-1 वैक्सीन) जैसे आवश्यक टीकों का अभाव है और यह दिल्ली में पशु उपचार के लिए आधुनिक बुनियादी ढांचे में भारी कमी को दर्शाता है।

दिल्ली सरकार का प्रतिनिधित्व स्थायी वकील संतोष कुमार त्रिपाठी और अधिवक्ता अरुण पंवार ने किया।

पीठ ने कहा कि अदालत याचिकाकर्ता की चिंताओं को समझती है लेकिन इस बात पर जोर देना जरूरी है कि पशु कल्याण सेवाओं के लिए सरकारी धन के आवंटन और विशिष्ट बीमारी के लिए टीकों की उपलब्धता को प्राथमिकता देने के फैसले उन विशेषज्ञों के अधिकार क्षेत्र में छोड़ दिए जाने चाहिए जो इन मुद्दों की जटिलताओं का आकलन करने में कुशल हैं।

पीठ ने कहा कि पशुओं को प्रभावित करने वाले किसी भी वायरस से निपटने की आवश्यकता का निर्धारण करने के लिए विशिष्ट जानकारी वाले विशेषज्ञों के बीच विचार-विमर्श की आवश्यकता होती है और मुफ्त में उपलब्ध कराए जाने वाले विशिष्ट टीकाकरण के लिए निर्देश जारी करना अदालत का अधिकार क्षेत्र नहीं है।

पीठ ने कहा कि शासन एक नाजुक संतुलन कार्य है, जहां राज्य को अपने सीमित संसाधनों को यह सुनिश्चित करते हुए विवेकपूर्ण ढंग से आवंटित करना चाहिए कि यह तत्काल और दीर्घकालिक दोनों तरह की चुनौतियों का समाधान करे।

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