देश की खबरें | निर्णय लिखना कला है, इसमें कानून और तर्क का कुशल समावेश शामिल है: उच्चतम न्यायालय

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नयी दिल्ली, सात सितंबर ‘निर्णय लिखना एक कला है जिसमें कानून और तर्क का कुशल समावेश होता है’, उच्चतम न्यायालय ने यह टिप्पणी करते हुए मंगलवार को कहा कि किसी तार्किक नतीजे तक पहुंचने को लेकर तथ्यों का पता लगाने के लिए न्यायिक निर्णय सुसंगत, व्यवस्थित होना चाहिए।

शीर्ष अदालत ने हत्या मामले में आरोपियों को जमानत दिए जाने के इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश को खारिज करते हुए कहा कि न्यायिक राय इस तरह से लिखी जानी चाहिए कि यह स्पष्ट हो और इस तथ्य को साबित करे कि फैसला सही है।

न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति एम आर शाह की पीठ ने कहा कि प्रत्येक फैसले में चार बुनियादी तत्व होते हैं- सामग्री (प्रासंगिक) तथ्यों का बयान, कानूनी मुद्दे या प्रश्न, निर्णय पर पहुंचने के लिए विचार-विमर्श और निर्णायक फैसला। पीठ ने कहा, ‘‘निर्णय सुसंगत, स्पष्ट और तार्किक रूप से व्यवस्थित होना चाहिए। यह पाठक को कानूनी सिद्धांतों के आधार पर एक तार्किक निष्कर्ष पर तथ्य का पता लगाने में सक्षम बनाने वाला होना चाहिए। किसी निर्णय को पढ़ने की कला को पूरी तरह से समझने के लिए निर्णय में महत्वपूर्ण तत्वों की जांच करना उचित है।’’

शीर्ष अदालत ने कहा कि ‘‘निर्णय’’ का अर्थ न्यायिक राय से है जो मामले की कहानी बताता है कि मामला क्या है, अदालत कैसे मामले को सुलझा रही है और क्यों। पीठ ने इस बात पर सहमति जताई कि न्यायाधीशों पर लंबित मामलों का बोझ हो सकता है, लेकिन मात्रा के लिए गुणवत्ता का त्याग कभी नहीं किया जा सकता है।

शीर्ष अदालत ने ये टिप्पणियां उत्तर प्रदेश निवासी शकुंतला शुक्ला द्वारा हत्या के एक मामले में पांच आरोपियों को जमानत देने के इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा पारित एक आदेश को चुनौती देने वाली अपील पर फैसला सुनाते हुए की।

पीठ ने कहा कि उच्च न्यायालय द्वारा पारित आदेश में तर्कों पर स्पष्टता का अभाव है कि आदेश का कौन सा हिस्सा तर्क को प्रस्तुत कर रहा है, आदेश का कौन सा हिस्सा तार्किक है।

शीर्ष अदालत ने कहा, ‘‘अंतिम राहत पर स्पष्टता होनी चाहिए। मुकदमे के एक पक्ष को पता होना चाहिए कि अंतिम राहत के माध्यम से उसे वास्तव में क्या मिला है। उपरोक्त पहलुओं को निर्णय लिखते समय ध्यान में रखा जाना चाहिए, जिससे अपीली अदालतों का बोझ कम हो जाएगा।

पीठ ने कहा, ‘‘हमारे सामने कई ऐसे फैसले आए हैं जिनमें तथ्यों, तर्कों और निष्कर्षों पर स्पष्टता का अभाव है और कई बार यह समझना बहुत मुश्किल होता है कि न्यायाधीश फैसले के माध्यम से क्या बताना चाहते हैं और इस वजह से मामलों को नए सिरे से विचार करना पड़ता है।’’ पीठ ने कहा कि इसलिए यह वांछनीय है कि निर्णय में तथ्यों और निष्कर्षों के संबंध में स्पष्टता होनी चाहिए।

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