मुंबई, 30 जून रिजर्व बैंक कुछ क्षेत्रों के कर्ज का पुनर्गठन करने पर विचार कर रहा है इस तरह की रिपोर्टों के बीच वैश्विक रेटिंग एजेंसी एस एण्ड पी ने मंगलवार को कहा कि कर्ज का पुनर्गठन केवल बैंकों के एनपीए की पहचान को आगे के लिये टालेगा और इससे समस्या का समाधान नहीं होगा।
एजेंसी ने कहा है कि महामारी की वजह से आई मंदी और कामकाज में बाधा का बैंकों पर जितना समझा जा रहा था उससके कहीं अधिक गहरा प्रभाव पड़ेगा और बैंकों की सकल गैर- निष्पादित परिसंपत्तियां वित्त वर्ष 2019- 20 के 8.5 प्रतिशत से बढ़कर 14 प्रतिशत तक पहुंच सकती है।
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एजेंसी का मानना है कि कोविड- 19 महामारी के प्रभाव से भारत के बैंकिग क्षेत्र में जो सुधार आ रहा था वह कई साल पीछे चला जायेगा। इससे रिण प्रवाह पर असर होगा और अंतत: अर्थव्यवस्था पर इसका प्रभाव पड़ेगा।
कोरोना वायरस महामारी के प्रकोप के चलते लॉकडाउन करना पड़ा और आर्थिक गतिविधियां पूरी तरह से बंद हो गई। इसकी वजह से रिजर्व बैंक को बैंकों से कर्ज लिये लोगों को छूट देते हुये छह महीने तक कर्ज की किस्तों को चुकाने से छूट देनी पड़ी।
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अब एक बार फिर ऐसी रिपोर्टें आ रही है कि रिजर्व बैंक कुछ उपायों के साथ कर्ज के पुनर्गठन की अनुमति देने जा रहा है। एजेंसी ने कहा, ‘‘ ... पुनर्गठन से संभवत: समस्या का निदान नहीं होगा। यह एनपीए पहचान को केवल आगे के लिये टालेगा, जैसा कि कुछ साल पहले हुआ था।’’
कोविड- 19 महामारी की वजह से कर्ज की वसूली कई साल पीछे चली जायेगी और इसके परिणामस्वरूप बैंकों की फंसी कर्ज की राशि यानी एनपीए में वृद्धि होगी।
रेटिंग एजेंसी स्टैण्डर्ड एण्ड पूअर्स की विश्लेषक दीपाली सेठ छाबरिया ने कहा भारतीय बैंकों का एनपीए 13 से 14 प्रतिशत तक पहुंच सकता है जो कि वित्त वर्ष 2019- 20 में 8.5 प्रतिशत पर है। ऐसे में बैंकों में फंसे कर्ज की स्थिति का दबाव बढ़ जायेगा। इनके समाधान में भी समय लगेगा। बहरहाल इस स्थिति में 2021- 22 में ही एक प्रतिशत तक सुधार आने का अनुमान है।
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