विदेश की खबरें | सूचना की अधिकता से निपटने के लिए आलोचनात्मक चिंतन के साथ आलोचनात्मक अनदेखी जरूरी

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बर्लिन/ब्रिस्टल/स्टैनफोर्ड, पांच फरवरी (द कन्वरसेशन) वेब सूचनात्मक स्वर्ग और नरक दोनों ही है। वेब पर उच्च गुणवत्ता की सूचना का असीम खजाना हमारी उंगलियों पर उपलब्ध है, लेकिन साथ ही कम गुणवत्ता वाली झूठी और भ्रामक सूचनाओं की भरमार भी है।

हमारी खोज को नियंत्रित करने वाले मंच जिज्ञासा या गुस्से से पैदा हुई सूचना को एकत्रित करके हमारा ध्यान भटकाने का काम करते हैं। हमारी आंखें स्क्रीन पर जितनी ज्यादा अटकी रहेंगी, ये मंच हमें उतने ही ज्यादा विज्ञापन दिखा सकेंगे और अपने शेयरधारकों के लिए ज्यादा मुनाफा कमा पाएंगे।

लिहाजा, इसमें हैरत की कोई बात नहीं है कि इन सबका असर हमारी सामूहिक संज्ञानात्मक क्षमता पर पड़ा है।

टि्वटर हैशटैग, गूगल पर पूछे गए सवालों और रेडिट टिप्पणियों को लेकर 2019 में किए एक विश्लेषण में पाया गया कि पिछले दशक में चीजों की लोकप्रियता बढ़ने और गिरने की दर तेज हो गई है। उदाहरण के लिए, 2013 में ट्विटर पर कोई हैशटैग औसतन 17.5 घंटे लोकप्रिय रहता था, लेकिन 2016 में इसकी लोकप्रियता औसतन 11.9 घंटे बाद खत्म हो जाती थी।

प्रतिस्पर्धा ज्यादा होने से चीजों पर ध्यान देने का हमारा समय घट गया है। इस पर नियंत्रण हासिल करने के लिए हमें संज्ञानात्मक रणनीतियों की आवश्यकता है।

आलोचनात्मक चिंतन काफी नहीं :

स्कूल में छात्रों को सूचना को सावधानीपूर्वक पढ़ना और उसका मूल्यांकन करना सिखाया जाता है। आलोचनात्मक ढंग से सोचने की क्षमता बहुत महत्वपूर्ण है। लेकिन, क्या सूचना की अधिकता और दुष्प्रचार के बढ़ते स्रोतों की दुनिया में यह काफी है? कम से कम दो वजहों से तो इसका जवाब ‘नहीं’ है।

पहली, डिजिटल दुनिया में पुस्तकालयों से ज्यादा सूचना मौजूद है। इसमें से ज्यादातर सूचना अप्रमाणिक स्रोतों से आती है, जिसमें विश्वसनीय संकेतकों की कमी होती है। सभी सूचनाओं और स्रोतों के आलोचनात्मक चिंतन से वास्तव में हमें कीमती सूचना को पढ़ने का समय कभी नहीं मिल पाएगा।

दूसरा, उन स्रोतों के आलोचनात्मक चिंतन में समय बर्बाद करना, जिन्हें पहले ही नजरअंदाज कर दिया गया था, दुर्भावनापूर्ण मंशा रखने वाले लोगों को वह उपहार देने के समान है, जिसकी वे चाह रखते हैं।

आलोचनात्मक अनदेखी :

हमारे हाल के लेख में एक दार्शनिक, दो संज्ञानात्मक वैज्ञानिकों और एक शैक्षिक विद्वान ने दलील दी कि जितनी जरूरत हमें आलोचनात्मक चिंतन की है, उतनी ही जरूरत आलोचनात्मक अनदेखी की भी है।

आलोचनात्मक अनदेखी का मतलब यह तय करने की क्षमता से है कि किस चीज को नजरअंदाज किया जाए और किसमें अपनी सीमित संज्ञात्मक क्षमता का निवेश किया जाए। आलोचनात्मक अनदेखी का मकसद सूचना की अधिकता की स्थिति में विवेकपूर्ण आदतों को अपनाने की प्रवृत्ति विकसित करना है।

इसके बिना, हम सूचनाओं के ऐसे समुद्र में बहेंगे, जो भ्रामक और हानिकारक होगा।

आलोचनात्मक अनदेखी के लिए उपकरण :

डिजिटल दुनिया में हम उन ‘नोटिफिकेशन’ को ‘ब्लॉक’ कर सकते हैं, जो हमारा ध्यान भटकाते हों। हम कुछ खास समय तय कर सकते हैं, जिसमें हमें संदेश मिलें। हम अपनी ‘डिजिटल डिफॉल्ट सेटिंग’ में बदलाव कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, हम लक्षित विज्ञापन के लिए अपने निजी डेटा के इस्तेमाल पर रोक लगा सकते हैं।

किसी स्रोत की विश्वसनीयता की अन्य स्रोत से तुलना करने की रणनीति से लोगों को यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि कैसे पेशेवर तथ्य जांचकर्ता ऑनलाइन सूचना की विश्वसनीयता सत्यापित करते हैं।

ट्रोलिंग का सीधा जवाब देने से बचें। ट्रोल करने वाले लोगों को ‘ब्लॉक’ भी किया जा सकता है।

हर कोई इन उपायों का इस्तेमाल कर सकता है। हालांकि, लोगों को इन उपायों से अवगत कराने के लिए शैक्षिक प्रयास महत्वपूर्ण हैं।

(द कन्वरसेशन)

(यह सिंडिकेटेड न्यूज़ फीड से अनएडिटेड और ऑटो-जेनरेटेड स्टोरी है, ऐसी संभावना है कि लेटेस्टली स्टाफ द्वारा इसमें कोई बदलाव या एडिट नहीं किया गया है)

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