देश की खबरें | पीएमएलए पर न्यायालय का फैसला : भाजपा ने बताया ‘ऐतिहासिक’, कांग्रेस ने जताई निराशा

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नयी दिल्ली, 27 जुलाई उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को प्रवर्तन निदेशालय की कुछ शक्तियों को बरकरार रखने का फैसला सुनाया जिसे लेकर केंद्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस की तरफ से विरोधाभासी प्रतिक्रियाएं आईं।

सत्ताधारी दल ने इसे एक "ऐतिहासिक निर्णय" बताया तो वहीं कांग्रेस ने चिंता व्यक्त की कि इससे जांच एजेंसी के “राजनीतिक दुरुपयोग” की आशंका बढ़ जाएगी।

न्यायालय ने धनशोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) के तहत गिरफ्तारी, धनशोधन में शामिल संपत्ति की कुर्की और जब्ती से संबंधित प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के अधिकारों को बरकरार रखा। कांग्रेस नेता कार्ति चिदंबरम समेत कई याचिकाकर्ताओं ने पीएमएलए के प्रावधानों को चुनौती दी थी।

फैसले का स्वागत करते हुए, भाजपा ने इसे एक “मील का पत्थर” बताया और कहा कि इससे विपक्षी नेताओं के “प्रचार” और कानून के खिलाफ राजनीतिक तर्कों को बंद हो जाना चाहिए।

फैसले के तत्काल बाद भाजपा अध्यक्ष जे पी नड्डा ने कहा कि देश के कानून का सम्मान निश्चित रूप से होना चाहिए।

उन्होंने संवाददाताओं से कहा, “उच्चतम न्यायालय ने धनशोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) और प्रवर्तन निदेशालय की शक्तियों और अधिकार क्षेत्र पर फैसला सुनाया है। न्यायालय ने पीएमएलए को बरकरार रखा है और ईडी के अधिकार क्षेत्र को भी मान्यता दी है। हम अपने सर्वोच्च न्यायालय और संविधान तथा हमारे कानून का भी सम्मान व आदर करते हैं।”

भाजपा प्रवक्ता गौरव भाटिया और नलिन कोहली ने फैसले की सराहना की और इसके प्रावधानों पर हमले के लिए विपक्षी दलों की आलोचना की। दोनों उच्चतम न्यायालय के वकील भी हैं।

भाटिया ने कहा कि यह एक "ऐतिहासिक निर्णय" था जिसने ईडी की आरोपियों को गिरफ्तार करने, उनके परिसरों की तलाशी लेने और उनकी संपत्ति को जब्त करने की शक्तियों को बरकरार रखा है, जिनके बारे में जांच एजेंसी को लगता है कि वे अपराध और धनशोधन की आय के माध्यम से अर्जित की गई हैं।

उन्होंने कहा, “"यह विपक्षी दलों, विशेष रूप से कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस और आम आदमी पार्टी (आप) के लिए एक करारा जवाब है जो ईडी के कामकाज पर सवाल उठा रहे हैं। उन्हें आत्मनिरीक्षण करना चाहिए क्योंकि कानून की विश्वसनीयता की पुष्टि उच्चतम न्यायालय द्वारा की गई है जबकि दूसरी तरफ विपक्ष की साख सबसे निचले स्तर पर है।”

न्यायालय द्वारा पीएमएलए के विभिन्न प्रावधानों पर सवाल उठाने वाले व्यक्तियों और अन्य संस्थाओं द्वारा दायर 200 से अधिक याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान कानून के प्रावधानों को बरकरार रखने रखने का जिक्र करते हुए कोहली ने कहा कि इस फैसले से विपक्ष का प्रचार और कानून के खिलाफ विपक्ष की दलीलें बंद हो जानी चाहिए।

राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने निराशा व्यक्त करते हुए कहा कि न्यायालय के फैसले के बाद केंद्र सरकार द्वारा ईडी के “राजनीतिक दुरुपयोग” की आशंका बढ़ सकती है।

गहलोत ने ट्वीट किया, ‘‘पीएमएलए एवं ईडी के अधिकारों पर माननीय उच्चतम न्यायालय का फैसला निराशाजनक एवं चिंताजनक है। देश में पिछले कुछ वर्षों से जो तानाशाही का माहौल बना हुआ है, इस फैसले के बाद केन्द्र सरकार द्वारा ईडी का राजनीतिक इस्तेमाल और अधिक करने की आशंका बढ़ जाएगी।’’

कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने एक बयान में कहा कि इस फैसले का ऐसे समय में देश के लोकतंत्र पर दूरगामी असर होगा जब सरकारें राजनीतिक प्रतिशोध में लगी हुई हैं।

रमेश ने ट्वीट किया, ‘‘उच्चतम न्यायालय द्वारा प्रवर्तन निदेशालय की शक्तियों को लेकर दिए गए फैसले का हमारे लोकतंत्र पर दूरगामी प्रभाव होगा और खासकर उस समय जब सरकारें राजनीतिक प्रतिशोध ले रही हैं।’’

उन्होंने कहा, ‘‘बहरहाल, इस फैसले के एक विशेष पहलू पर मैं तत्काल बात करना चाहूंगा। मैंने मोदी सरकार द्वारा धन विधेयक के सरेआम दुरुपयोग किए जाने को लेकर उच्चतम न्यायालय का रुख किया था। उच्चतम न्यायालय ने मेरी याचिका पर दो जुलाई, 2019 को नोटिस जारी किया था। आज के फैसले से यह सवाल अनसुझला ही रह गया।’’

रमेश का कहना था कि उच्चतम न्यायालय ने कुछ मामलों को व्यापक पीठ द्वारा सुनवाई के लिए छोड़ दिया है और यह कुछ संतोष का विषय है।

कांग्रेस नेताओं सोनिया गांधी, राहुल गांधी, पी. चिदंबरम, उनके बेटे एवं सांसद कार्ति चिदंबरम, शिवसेना के नेता संजय राउत, नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता फारूक अब्दुल्ला, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के भतीजे एवं तृणमूल कांग्रेस के नेता अभिषेक बनर्जी और दिल्ली के मंत्री सत्येंद्र जैन सहित कई शीर्ष विपक्षी राजनीतिज्ञ कथित धनशोधन के लिए ईडी के निशाने पर हैं।

न्यायालय ने यह देखते हुए कि यह दुनियाभर में एक सामान्य अनुभव है कि धनशोधन एक वित्तीय प्रणाली के अच्छे कामकाज के लिए ‘‘खतरा’’ हो सकता है, पीएमएलए के कुछ प्रावधानों की वैधता को बरकरार रखा और कहा कि यह एक ‘‘साधारण अपराध’’ नहीं है।

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