देश की खबरें | न्यायालय ने चिकित्सकों द्वारा जारी किए जा रहे फर्जी कोविड मृत्यु प्रमाण पत्र को लेकर चिंता जताई

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नयी दिल्ली, सात मार्च उच्चतम न्यायालय ने चिकित्सकों द्वारा मुआवजे (अनुग्रह राशि) के लिए जारी किए जा रहे फर्जी कोविड मृत्यु प्रमाण पत्रों को लेकर चिंता व्यक्त की और कहा कि वह इस मुद्दे की जांच का आदेश दे सकता है।

न्यायमूर्ति एम. आर. शाह और न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना की पीठ ने कहा कि मुआवजे की मांग करने वाले दावों के लिए कुछ समय सीमा होनी चाहिए। पीठ ने कहा, ‘‘चिंता की बात यह है कि चिकित्सकों द्वारा फर्जी प्रमाण पत्र दिये जा रहे है... यह बहुत ही गंभीर बात है।’’

उच्चतम न्यायालय ने कहा कि कुछ समय सीमा होनी चाहिए, अन्यथा प्रक्रिया अंतहीन रूप से चलेगी।

पीठ ने कहा, ‘‘कृपया सुझाव दें कि हम चिकित्सकों द्वारा जारी किए जा रहे फर्जी प्रमाणपत्रों के मुद्दे पर कैसे अंकुश लगा सकते हैं। यह किसी का वास्तविक हक छीन सकता है।’’

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी कि दावों को प्रस्तुत करने के लिए एक अंतिम समय सीमा होनी चाहिए।

मेहता ने दलील दी की कि उच्चतम न्यायालय ने आदेश दिया है कि मुआवजे के लिए आरटी-पीसीआर प्रमाणपत्र आवश्यक नहीं है और चिकित्सक के प्रमाण पत्र के आधार पर इसकी अनुमति दी जा सकती है।

उन्होंने कहा, ‘‘इस छूट का दुरुपयोग हो रहा है।’’

पीठ ने इस मुद्दे पर सुझाव मांगे और मामले की अगली सुनवाई की तिथि 14 मार्च निर्धारित की।

उच्चतम न्यायालय ने पहले सभी राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया था कि वे राज्य कानूनी सेवा प्राधिकरण (एसएलएसए) के सदस्य सचिव के साथ समन्वय करने के लिए एक समर्पित नोडल अधिकारी नियुक्त करें ताकि कोविड​​-19 पीड़ितों के परिवार के सदस्यों को मुआवजे का भुगतान किया जा सके।

इसने राज्य सरकारों को आज (शुक्रवार) से एक सप्ताह के भीतर संबंधित एसएलएसए को नाम, पता और मृत्यु प्रमाण पत्र के साथ-साथ अनाथों से संबंधित पूर्ण विवरण देने का भी निर्देश दिया था और कहा कि ऐसा नहीं करने पर मामले को बहुत गंभीरता से लिया जाएगा।

उच्चतम न्यायालय गौरव बंसल और अन्य लोगों द्वारा दायर याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा था, जिनका प्रतिनिधित्व वकील सुमीर सोढ़ी ने किया। याचिका में कोविड​​-19 पीड़ितों के परिवार के सदस्यों को अनुग्रह सहायता राशि देने का अनुरोध किया गया है।

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