नयी दिल्ली, 17 अगस्त उच्चतम न्यायालय ने दिव्यांगजन (पीडब्ल्यूडी) श्रेणी के तहत स्नातकोत्तर (पीजी) चिकित्सा पाठ्यक्रम में दाखिले के निर्देश को लेकर लोकोमोटर दिव्यांगता से प्रभावित एक डॉक्टर की याचिका पर केंद्र और अन्य से जवाब मांगा है।
लोकोमोटर दिव्यांगता शब्द का इस्तेमाल सेरेब्रल पाल्सी के कई रूपों या हड्डियों, जोड़ों या मांसपेशियों से जुड़ी दिक्कतों के लिए किया जाता है। इससे अंगों की गति काफी हद तक प्रभावित होती है।
न्यायमूर्ति एस रवींद्र भट और न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा की पीठ ने सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय, राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग (एनएमसी) और अन्य को नोटिस जारी कर 11 सितंबर तक जवाब मांगा है।
शीर्ष अदालत डॉ. धर्मेंद्र कुमार की याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें उन्होंने पीडब्ल्यूडी श्रेणी के तहत स्नातकोत्तर चिकित्सा पाठ्यक्रम में प्रवेश की मांग की है।
नियमों के अनुसार, 40 से 80 प्रतिशत दिव्यांगता वाले उम्मीदवारों को दिव्यांगजन के लिए कोटा के तहत चिकित्सा पाठ्यक्रमों के लिए अनुमति दी जाती है, जबकि 80 प्रतिशत से ऊपर वाले उम्मीदवारों को भी मामले के आधार पर अनुमति दी जा सकती है और उनकी कार्यात्मक योग्यता सहायक उपकरणों की सहायता से निर्धारित की जाएगी।
प्रतिशत-आधारित दिव्यांगता मूल्यांकन पर सवाल उठाते हुए याचिका में कहा गया कि दिव्यांगता का सटीक प्रतिशत निर्धारित करना अक्सर व्यक्तिपरक होता है और मूल्यांकनकर्ता के आधार पर भिन्न हो सकता है।
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील गौरव कुमार बंसल ने कहा कि एनएमसी द्वारा अपनाई गई ‘‘दोषपूर्ण और अवैज्ञानिक’’ पद्धति के कारण हजारों दिव्यांग मेडिकल उम्मीदवार एमबीबीएस और एमडी पाठ्यक्रम करने के अवसर से वंचित हो गए हैं।
बंसल ने कहा कि दो अलग-अलग सरकारी मेडिकल बोर्ड ने याचिकाकर्ता को न केवल दो अलग-अलग प्रतिशत प्रदान किए हैं, बल्कि दिव्यांगता की प्रकृति भी बदल दी है।
वकील ने कहा, ‘‘विशिष्ट दिव्यांगता पहचान पत्र देने के लिए गठित मेडिकल बोर्ड के अनुसार डॉ. धर्मेंद्र लोकोमोटर दिव्यांगता से पीड़ित हैं और 45 प्रतिशत दिव्यांग हैं। हालाकि, एनएमसी द्वारा अधिकृत मेडिकल बोर्ड के अनुसार, डॉ. धर्मेंद्र क्रोनिक न्यूरोलॉजिकल दिव्यांगता से पीड़ित हैं और 55 प्रतिशत दिव्यांग हैं। एनएमसी ने सिंह की दिव्यांगता के आधार पर एमडी पाठ्यक्रम करने की उनकी उम्मीदवारी को खारिज कर दिया है।’’
उन्होंने याचिका में कहा है कि एनएमसी ने अपनी बोर्ड बैठक में स्वीकार किया था कि विशिष्ट पीजी पाठ्यक्रम पर गौर करने की जरूरत है जिन्हें विभिन्न प्रकार की दिव्यांगता से प्रभावित छात्र कर सकते हैं।
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