देश की खबरें | न्यायालय ने जमानत पाने के लिए ठगी गई रकम जमा करने की प्रवृत्ति पर ध्यान दिलाया

नयी दिल्ली, चार जुलाई उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को एक ऐसी प्रवृत्ति के उभरने को रेखांकित किया, जिसमें धोखाधड़ी के आरोपी जमानत पाने के लिए पीड़ितों से ठगी की गई रकम जमा करने का शपथपत्र अदालतों में देते हैं।

न्यायालय ने अदालतों को आगाह किया कि वे इस तरह के अनुरोध के झांसे में ना आएं।

न्यायमूर्ति एस रवींद्र भट और न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता की पीठ ने दिल्ली उच्च न्यायालय को एक विषय वापस भेज दिया, जिसमें उसने संपत्ति विवाद से जुड़े एक मामले में धोखाधड़ी के आरोपी व्यक्ति को इस शर्त पर जमानत दी थी कि वह कथित तौर पर ठगे गये 22 लाख रुपये जमा करेगा।

पीठ ने कहा, ‘‘पिछले कई महीनों में विभिन्न मामलों में यह पाया गया है कि भारतीय दंड संहिता की धारा 420 के तहत प्राथमिकी दर्ज किये जाने के बाद, ठगी के आरोपियों द्वारा दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 438 के तहत आदेश पाने के लिए शुरू की गई न्यायिक कार्यवाही कथित रूप से ठगी गई रकम वापस पाने की प्रक्रिया में अनजाने में तब्दील हो रही है।’’

न्यायालय ने कहा, ‘‘अदालतें अग्रिम जमानत देने के लिए जरूरी रकम जमा करने की शर्तें लगा देती हैं।’’

न्यायालय ने कहा कि इस तरह की प्रवृत्ति ने हाल के समय में जोर पकड़ा है। इसने कहा, ‘‘उच्च न्यायालयों और सत्र अदालतों को यह याद दिलाना उपयुक्त है कि वे सीआरपीसी की धारा 438 के तहत जमानत का अनुरोध करने वाले आरोपी की ओर से कोई भी रकम जमा करने का शपथपत्र देने संबंधी उसके वकील की दलीलों पर गौर नहीं करें।’’

पीठ ने कहा कि जमानत का अनुरोध करने वाले आरोपियों द्वारा भुगतान करने की शर्त शामिल करने से यह धारणा बनेगी कि ठगी की गई रकम जमा कर राहत हासिल की जा सकती है।

न्यायालय ने कहा, ‘‘यह जमानत प्रदान करने के प्रावधान का उद्देश्य और इरादा नहीं है।’’

पीठ ने कहा कि अपवाद वाले मामलों में, जैसे कि जहां सार्वजनिक धन के गबन का आरोप लगाया गया हो, अदालतों के लिए जनहित में यह विचार करने का विकल्प खुला है कि इस तरह के धन को अग्रिम या नियमित जमानत अर्जी से पहले जमा कराने की अनुमति देना है या नहीं।

शीर्ष न्यायालय ने रमेश कुमार नाम के व्यक्ति द्वारा दायर एक अपील पर यह टिप्पणी की, जो दिल्ली में एक अचल संपत्ति के मालिक हैं।

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