नयी दिल्ली, 28 अगस्त उच्चतम न्यायालय ने मध्यस्थ नियुक्त होने के अपात्र व्यक्ति द्वारा किसी दूसरे व्यक्ति को नामित करने के जटिल कानूनी प्रश्न पर बुधवार को दलीलें सुननी शुरू कर दी।
प्रधान न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पांच-सदस्यीय संविधान पीठ ने मध्यस्थों की नियुक्ति सहित मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 के प्रावधानों से संबंधित दलीलें सुनीं।
पीठ में न्यायमूर्ति ऋषिकेश रॉय, न्यायमूर्ति पी एस नरसिम्हा, न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा भी शामिल हैं।
न्यायालय ने कहा, ‘‘जब विभिन्न पक्ष मध्यस्थता का मार्ग अपना रहे हैं, तो एक स्वतंत्र निर्णयकर्ता या स्वतंत्रता की कमी की उनकी धारणा महत्वपूर्ण हो जाती है। इसलिए, आपको ऐसी स्थितियां बनानी चाहिए जो प्रक्रिया में विश्वास की भावना को बढ़ावा दे।’’
एक पक्ष की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील एन. के. कौल ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति मध्यस्थ के रूप में नियुक्त होने में अक्षम या अपात्र है, तो वह किसी मुद्दे का निस्तारण करने के लिए मध्यस्थों का एक पैनल नामित या मुहैया नहीं कर सकता है।
दूसरे पक्ष की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील गौरव बनर्जी ने एक निष्पक्ष, स्वतंत्र और न्याय संगत मध्यस्थता अधिकरण की आवश्यकता पर जोर दिया।
प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ‘‘अगर कोई मध्यस्थता समझौता नहीं है, तो अदालत किसी पक्ष पर मध्यस्थता नहीं थोप सकती।’’
दिन भर चली बहस के दौरान, विधि आयोग की 246वीं रिपोर्ट का भी हवाला दिया गया, जो 1996 के अधिनियम में संशोधन से संबंधित है।
दलीलें बृहस्पतिवार को भी पेश की जाएंगी।
केंद्र ने 21 फरवरी को शीर्ष अदालत को बताया था कि पूर्व विधि सचिव टी.के. विश्वनाथन की अध्यक्षता वाली एक विशेषज्ञ समिति ने मध्यस्थता क्षेत्र में प्रस्तावित सुधारों पर अपनी रिपोर्ट कानून मंत्रालय को सौंप दी है।
भारत को अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता का केंद्र बनाने के प्रयास के बीच, सरकार ने अदालतों पर मुकदमों का बोझ कम करने के लिए मध्यस्थता और सुलह अधिनियम में सुधार की सिफारिश करने के लिए विश्वनाथन के नेतृत्व में एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया था।
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