विदेश की खबरें | ‘समिट ऑफ अमेरिकाज’ में लातिन अमेरिकी देशों के शामिल न होने पर विवाद

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on world at LatestLY हिन्दी. इस साल शिखर सम्मेलन का विषय ‘‘एक सतत, लचीले और न्यायसंगत भविष्य का निर्माण’’ था।

इस साल शिखर सम्मेलन का विषय ‘‘एक सतत, लचीले और न्यायसंगत भविष्य का निर्माण’’ था।

बाइडन ने सम्मेलन की शुरुआत में कहा, ‘‘ऐसी कोई वजह नहीं है कि पश्चिमी गोलार्ध दुनिया में सबसे अग्रणी दृष्टिकोण वाला सबसे बेहतर लोकतांत्र और सबसे समृद्ध, सबसे शांतिपूर्ण व सबसे सुरक्षित क्षेत्र नहीं बन सकता।’’

बाइडन के इस बयान के तुरंत बाद बेलीज के प्रधानमंत्री जॉन ब्रिसेन्यो ने कुछ देशों को शिखर सम्मेलन से बाहर रखने जाने और क्यूबा में अमेरिका द्वारा लगातार लगाए जा रहे प्रतिबंधों पर आपत्ति जताई।

ब्रिसेन्यो ने कहा, ‘‘यह शिखर सम्मेलन पूरे अमेरिका का है। इसलिए यह बात माफी के योग्य नहीं है कि अमेरिका के कुछ ऐसे देश हैं, जो इसमें शामिल नहीं हुए। उनकी अनुपस्थिति से शिखर सम्मेलन की शक्ति और प्रभाव कम हुआ है।’’

उन्होंने कहा, ‘‘इस महत्वपूर्ण समय में, जब हमारे गोलार्ध का भविष्य दांव पर है और हम विभाजित हैं, तब अमेरिकी देशों के इस शिखर सम्मेलन को समावेशी होना चाहिए था। राजनीतिक नहीं, भौगोलिक परिदृश्य अमेरिका को परिभाषित करता है।’’

वहीं, अर्जेंटीना के राष्ट्रपति अल्बर्टो फर्नांडीज ने भी बाइडन की आलोचना की। उन्होंने कहा, ‘‘हम निश्चित रूप से एक अलग तरह के अमेरिका के शिखर सम्मेलन की कामना करते हैं।’’

मैक्सिको के राष्ट्रपति एंड्रेस मैनुअल लोपेज ओब्रेडोर चाहते थे कि वेनेजुएला, क्यूबा और निकारागुआ के नेताओं को आमंत्रित किया जाए, लेकिन अमेरिका ने इसका विरोध किया, क्योंकि वह उन्हें सत्तावादी मानता है। अंतत: सहमति नहीं बन पाई और ओब्रेडोर ने सम्मेलन में शामिल न होने का फैसला किया, जबकि लातिन अमेरिकी देश ग्वाटेमाला, होंडुरास तथा अल सल्वाडोर ने भी इस सम्मलेन का बहिष्कार किया।

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