देश की खबरें | कांग्रेस ने भारत-चीन संबंधों के संपूर्ण आयाम पर संसद में चर्चा किए जाने की मांग की

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. कांग्रेस ने भारत-चीन संबंधों पर संसद में दिए गए बयान को लेकर सरकार पर निशाना साधते हुए रविवार को मांग की कि संसद को दोनों देशों के बीच संबंधों के संपूर्ण आयाम पर बहस करने का अवसर दिया जाना चाहिए।

नयी दिल्ली, आठ दिसंबर कांग्रेस ने भारत-चीन संबंधों पर संसद में दिए गए बयान को लेकर सरकार पर निशाना साधते हुए रविवार को मांग की कि संसद को दोनों देशों के बीच संबंधों के संपूर्ण आयाम पर बहस करने का अवसर दिया जाना चाहिए।

इसके साथ ही कांग्रेस ने सवाल किया कि क्या प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार अप्रैल 2020 से पहले की ‘‘पुरानी सामान्य स्थिति’’ के स्थान पर ‘‘नयी सामान्य स्थिति’’ पर सहमत हो गई है।

कांग्रेस महासचिव (संचार प्रभारी) जयराम रमेश ने कहा कि भारत-चीन संबंधों पर संसद में चर्चा रणनीतिक और आर्थिक नीति दोनों पर केंद्रित होनी चाहिए, खासकर इसलिए क्योंकि चीन पर देश की निर्भरता आर्थिक रूप से बढ़ गई है, जबकि उसने चार साल पहले हमारी सीमाओं पर यथास्थिति को एकतरफा रूप से बदल दिया था।

रमेश ने एक बयान में कहा कि कांग्रेस ने संसद के दोनों सदनों में ‘चीन के साथ भारत के संबंधों में हालिया घटनाक्रम ’ शीर्षक से विदेश मंत्री एस जयशंकर द्वारा हाल में अपनी ओर से दिए गए बयान का अध्ययन किया है।

उन्होंने कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण, लेकिन मोदी सरकार की चिर-परिचित राजनीति का हिस्सा है कि सांसदों को किसी तरह के स्पष्टीकरण की मांग करने की अनुमति नहीं दी गई।

रमेश ने कहा कि भारत-चीन सीमा संबंधों के कई पहलुओं की संवेदनशील प्रकृति को पूरी तरह ध्यान में रखते हुए कांग्रेस के पास मोदी सरकार से पूछने के लिए चार सवाल हैं।

कांग्रेस महासचिव ने कहा कि बयान में दावा किया गया है कि ‘‘सदन उन परिस्थितियों से पूरी तरह अवगत है जिनके कारण जून 2020 में गलवान घाटी में हिंसक झड़प हुई।’’

उन्होंने कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस संकट पर राष्ट्र का पहला आधिकारिक बयान 19 जून, 2020 को तब आया, जब प्रधानमंत्री ने चीन को सार्वजनिक रूप से क्लीन चिट दे दी थी और झूठा बयान दिया था कि ‘‘न कोई हमारी सीमा में घुस आया है, न ही कोई घुसा हुआ है।’’

रमेश ने कहा, ‘‘यह न केवल हमारे शहीद सैनिकों का अपमान था, बल्कि इससे बाद की वार्ताओं में भारत की स्थिति भी कमजोर हुई। प्रधानमंत्री को यह बयान देने के लिए किस बात ने मजबूर किया?’’

उन्होंने कहा, ‘‘22 अक्टूबर 2024 को सेनाध्यक्ष जनरल उपेन्द्र द्विवेदी ने भारत की दीर्घकालिक स्थिति को दोहराया: ‘जहां तक हमारा सवाल है, हम अप्रैल 2020 की पूर्व की स्थिति पर वापस जाना चाहते हैं... उसके बाद हम सैनिकों की वापसी, तनाव कम करने और एलएसी (वास्तविक नियंत्रण रेखा) के सामान्य प्रबंधन की बात करेंगे’।’’

रमेश ने कहा, ‘‘लेकिन पांच दिसंबर 2024 को भारत-चीन सीमा मामलों पर परामर्श और समन्वय के लिए कार्य तंत्र (डब्ल्यूएमसीसी) की 32वीं बैठक के बाद विदेश मंत्रालय के बयान में कहा गया कि ‘दोनों पक्षों ने सेनाओं के पीछे हटने संबंधी सबसे हालिया समझौते के कार्यान्वयन की सकारात्मक पुष्टि की है जिससे 2020 में उभरे मुद्दों का समाधान हो गया।’’

उन्होंने कहा, ‘‘क्या इससे हमारे आधिकारिक रुख में बदलाव का पता नहीं चलता?’’

रमेश ने कहा कि संसद में विदेश मंत्री के बयान में कहा गया है कि ‘‘कुछ अन्य स्थानों पर जहां 2020 में टकराव हुआ था, वहां आगे ऐसी स्थिति को टालने के लिए स्थानीय परिस्थितियों के आधार पर अस्थायी और सीमित तरीके के कदम उठाए गए हैं।’’

उन्होंने कहा कि यह स्पष्ट रूप से तथाकथित ‘‘बफर जोन’’ को संदर्भित करता है जहां हमारे सैनिकों और पशुपालकों को पहले की तरह जाने से वंचित कर दिया गया है।

रमेश ने कहा, ‘‘इन बयानों को एक साथ मिलाकर देखें तो पता चलता है कि विदेश मंत्रालय एक ऐसे समझौते को स्वीकार कर रहा है जो सेना और राष्ट्र की इच्छानुसार वास्तविक नियंत्रण रेखा को अप्रैल 2020 की पूर्व की स्थिति पर वापस नहीं लाता है। क्या मोदी सरकार अप्रैल 2020 से पहले की ‘‘पुरानी सामान्य स्थिति’’ में चीन द्वारा एकतरफा छेड़छाड़ किए जाने के बाद नयी स्थिति पर सहमत हो गई है और ‘‘नयी सामान्य स्थिति’’ को मानने के लिए तैयार हो गई है?’’

उन्होंने कहा कि चीन की सरकार ने अभी तक देपसांग और डेमचोक में सैनिकों की वापसी को लेकर किसी भी विवरण की पुष्टि क्यों नहीं की है?

कांग्रेस महासचिव ने कहा, ‘‘क्या भारत के पशुपालकों के लिए चराई के लिए उनके पहले जैसे अधिकार बहाल कर दिए गए हैं? क्या पारंपरिक गश्त बिंदुओं तक बिना रोक-टोक के पहुंच होगी? क्या पिछली वार्ता के दौरान छोड़े गए ‘बफर जोन’ भारत ने वापस ले लिए हैं?’’

रमेश ने कहा कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पिछले कुछ वर्षों से जो मांग कर रही है उसे फिर से दोहराती है - संसद को चीन मामले में सामूहिक राष्ट्रीय संकल्प प्रतिबिंबित करने के लिए बहस का अवसर दिया जाना चाहिए।

उन्होंने कहा, ‘‘इस चर्चा में रणनीतिक और आर्थिक दोनों ही नीतियों पर विशेष रूप से ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए - ऐसा इसलिए क्योंकि चीन पर हमारी निर्भरता आर्थिक रूप से बढ़ी है और उसने चार साल पहले एकतरफा ढंग से हमारी सीमाओं पर पूर्व की स्थिति को बदला है।’’

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