देश की खबरें | गैरकानूनी गतिविधियों के अपराधीकरण को बरकरार रखते हुए 124ए हटाने से केंद्र को फायदा : पूर्व नौकरशाह
Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. राजद्रोह के प्रावधान को निलंबित करने के एक माह बाद 100 से अधिक पूर्व नौकरशाहों के एक समूह ने रविवार को कहा कि गैर-कानूनी गतिविधि निरोधक कानून (यूएपीए) के तहत ‘गैरकानूनी गतिविधियों’ के अपराधीकरण को बरकरार रखते हुए भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 124ए को हटाने से केंद्र सरकार और राष्ट्रीय स्तर पर सत्तारूढ़ दल को ‘पर्याप्त राजनीतिक लाभ’ मिलेगा।
नयी दिल्ली, 12 जून राजद्रोह के प्रावधान को निलंबित करने के एक माह बाद 100 से अधिक पूर्व नौकरशाहों के एक समूह ने रविवार को कहा कि गैर-कानूनी गतिविधि निरोधक कानून (यूएपीए) के तहत ‘गैरकानूनी गतिविधियों’ के अपराधीकरण को बरकरार रखते हुए भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 124ए को हटाने से केंद्र सरकार और राष्ट्रीय स्तर पर सत्तारूढ़ दल को ‘पर्याप्त राजनीतिक लाभ’ मिलेगा।
किसी राजनीतिक दल से संबद्ध न होने का दावा करने वाले इस समूह ने सुझाव दिया कि शीर्ष अदालत को ‘संविधान की बुनियादी संरचना’ के सिद्धांत के तहत अनुच्छेद 19 की पड़ताल सभी मौजूदा कानूनों और प्रावधानों के संदर्भ में करनी चाहिए, जो ‘बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ पर अंकुश लगाते हैं।
शीर्ष अदालत ने 11 मई को राजद्रोह के औपनिवेशिक कालीन दंडात्मक प्रावधान के इस्तेमाल पर तब तक के लिए रोक लगा दी थी, जब तक कि एक ‘उपयुक्त’ सरकारी मंच इसकी फिर से जांच नहीं कर लेता। न्यायालय ने केंद्र और राज्य सरकारों को इस अपराध के तहत कोई नयी प्राथमिकी दर्ज न करने का निर्देश दिया था।
प्रधान न्यायाधीश एन. वी. रमण की अध्यक्षता वाली पीठ ने व्यवस्था दी थी कि प्राथमिकी दर्ज करने पर रोक के अलावा देशभर में देशद्रोह कानून के तहत पहले से चल रही जांच, लंबित मुकदमे और सभी कार्यवाही को भी स्थगित रखा जाएगा।
संवैधानिक आचरण समूह (सीसीजी) ने 108 पूर्व नौकशाहों द्वारा हस्ताक्षरित एक खुले बयान में कहा, ‘‘महत्वपूर्ण रूप से कोई भी राजनीतिक दल इस संबंध में निर्दोष नहीं है और सभी राजनीतिक दलों की सरकारें मानवाधिकारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कुचल रही हैं।’’ ये पूर्व नौकरशाह केंद्र और राज्य सरकारों के साथ काम कर चुके हैं।
हस्ताक्षर करने वालों में रिसर्च एनालिसिस विंग (रॉ) के पूर्व प्रमुख ए. एस. दुलत, पूर्व कैबिनेट सचिव के. एम. चंद्रशेखर, पूर्व मुख्य सूचना आयुक्त (सीआईसी) वजाहत हबीबुल्लाह, पूर्व गृह सचिव जी. के. पिल्लई, सिक्किम के पूर्व पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) अविनाश मोहनाने और पूर्व अतिरिक्त सचिव राणा बनर्जी शामिल हैं।
बयान में कहा गया है कि किसी भी मौजूदा सरकार के प्रति अरुचि और अवमानना ऐसी भावनाएं हैं, जिनके माध्यम से लोकतांत्रिक गणराज्यों का जन्म होता है और ऐसी भावनाओं को तानाशाही में ही अपराध माना जाता है।
बयान के मुताबिक, धारा 124ए से संबंधित मामलों में दोषसिद्धि की कम दर जांच और अभियोजन के दौरान किए गए दावों की वास्तविकता के बारे में गंभीर संदेह पैदा करती है और ‘यह दर्शाती है कि ऐसे कानूनों का वास्तविक उद्देश्य निरंकुश शासकों को प्रतिद्वंद्वियों के दमन और जनता की राय को नियंत्रत करने के लिए एक शक्तिशाली हथियार प्रदान करना है।’
पत्र में कहा गया है कि अतीत में असहमति और विरोध को दबाने तथा स्वतंत्र जनमत को नियंत्रित करने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले ‘हथियारों’ में धारा 124ए में शामिल अपराधों जैसे कई अपराधों को शामिल किया जा चुका है, जिनमें आईपीसी की धारा 153ए (धर्म, जाति, जन्म स्थान आदि के आधार पर विभिन्न समूहों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देना), 153बी (अभ्यारोपण, राष्ट्रीय एकता के लिए हानिकारक दावे), 505 (सार्वजनिक शरारत के लिए अनुकूल बयान) और 505 (2) (वर्गों के बीच शत्रुता, घृणा या दुर्भावना पैदा करने या बढ़ावा देने वाले बयान) प्रमुख हैं।
बयान में कहा गया है, ‘‘यूएपीए के तहत 'गैरकानूनी गतिविधियों' के अपराधीकरण को बरकरार रखते हुए आईपीसी से धारा 124ए को हटाने से केंद्र सरकार और राष्ट्रीय स्तर पर सत्तारूढ़ पार्टी को पर्याप्त राजनीतिक लाभ मिलेगा।’’
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