नयी दिल्ली, 15 जून आदिवासियों के एक प्रमुख संगठन ने उच्चतम न्यायालय में आरोप लगाया है कि केंद्र सरकार और मणिपुर के मुख्यमंत्री संयुक्त रूप से एक साम्प्रदायिक एजेंडा को आगे बढ़ा रहे हैं, जिसका लक्ष्य पूर्वोत्तर राज्य में कुकी जनजाति के लोगों का जातीय सफाया करना है।
राज्य में हुई जातीय हिंसा के मद्देनजर गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) ने शीर्ष न्यायालय से अनुरोध किया कि वह केंद्र के खोखले आश्वासन पर भरोसा नहीं करे। साथ ही उसने, अल्पसंख्यक कुकी आदिवासियों की सेना द्वारा सुरक्षा किये जाने का आग्रह किया।
शीर्ष न्यायालय में एक अर्जी दायर करने वाले ‘मणिपुर ट्राइबल फोरम’ ने कहा, ‘‘प्राधिकारों के आश्वासन न तो अब कहीं से भी उपयोगी हैं और ना ही ये गंभीरता के साथ किए गए हैं... यहां तक कि उन्हें लागू किये जाने का इरादा भी नहीं है।’’
इसने कहा, ‘‘इस न्यायालय को भारत संघ द्वारा किये गये वादों पर भरोसा नहीं करना चाहिए क्योंकि इसने और राज्य के मुख्यमंत्री ने कुकी लोगों का जातीय सफाया करने के लिए संयुक्त रूप से एक साम्प्रदायिक एजेंडा शुरू किया है।’’
गैर सरकारी संगठन ने दावा किया कि आश्वासन दिये जाने के बावजूद, कुकी जनजाति से ताल्लुक रखने वाले 81 और लोग 17 मई से मारे गये हैं और 31,410 लोग विस्थापित हुए हैं। न्यायालय ने पिछली बार 17 मई को ही इस मामले की सुनवाई की थी।
अर्जी में कहा गया है कि दो समुदायों के बीच ‘टकराव’ का विमर्श सच्चाई से दूर है, क्योंकि दोनों समुदाय लंबे समय से एक दूसरे के साथ रहते आये हैं।
इसने कहा, ‘‘इस तरह का विमर्श इसे नजरअंदाज करता है कि कभी-कभी गहरे मतभेद होने के बावजूद दो समुदायों का लंबे समय से सह-अस्तित्व रहा है। अनूठी स्थिति अभी दो सशस्त्र साम्प्रदायिक समूहों की है जिनका संबंध राज्य में सत्तारूढ़ पार्टी से है। ये समूह आदिवासियों पर सुनियोजित तरीके से हमले कर रहे हैं।’’
अर्जी में कहा गया है, ‘‘टकराव से जुड़ा विमर्श सभी हमलों के पीछे इन दोनों समूहों की मौजूदगी को छिपाता है तथा उन्हें अभियोजन से बचा कर और हमलों के लिए प्रेरित करता है।’’
एनजीओ ने असम पुलिस के पूर्व प्रमुख हरेकृष्ण डेका की अध्यक्षता में एक विशेष जांच टीम गठित करने और प्रत्येक व्यक्ति के परिजन को दो दो करोड़ रुपये की अनुग्रह राशि देने का अनुरोध किया है। संगठन ने मारे गये लोगों के परिवार के एक-एक सदस्य को सरकारी नौकरी देने की भी मांग की है।
शीर्ष न्यायालय ने 17 मई को मणिपुर सरकार को निर्देश दिया था कि वह जातीय हिंसा से प्रभावित राज्य में विश्वास बहाली, शांति और स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए कदम उठाए। उच्चतम न्यायालय ने यह भी कहा था कि शीर्ष न्यायालय होने के नाते वह सुनिश्चित कर सकता है कि राजनीतिक मशीनरी स्थिति को लेकर ‘‘आंखें ना मूंदे।’’
मणिपुर के मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह के कथित भड़काऊ भाषणों के संबंध में सौंपे गए साक्ष्यों पर संज्ञान लेते हुए शीर्ष न्यायालय ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से कहा था कि संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति को संयम बरतने की सलाह दें।
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