देश की खबरें | सीबीआई ने ऋण घोटाला मामले में वधावन बंधुओं को दी गई वैधानिक जमानत का विरोध किया

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नयी दिल्ली, 12 दिसंबर केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) ने करोड़ों रुपये के बैंक ऋण घोटाला मामले में दीवान हाउसिंग फाइनेंस कॉरपोरेशन लिमिटेड (डीएचएफएल) के पूर्व प्रवर्तकों कपिल वधावन और उनके भाई धीरज वधावन को निचली अदालतों द्वारा दी गई वैधानिक जमानत का मंगलवार को उच्चतम न्यायालय में विरोध किया।

सीबीआई की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) एस वी राजू ने न्यायमूर्ति बेला एम त्रिवेदी और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की पीठ से कहा कि मामले में आरोप पत्र 90 दिनों की वैधानिक अवधि के भीतर दायर किया गया था और इसके बावजूद अभियुक्तों को वैधानिक जमानत दी गई।

दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) के तहत अगर जांच एजेंसी 60 या 90 दिनों की अवधि के भीतर किसी आपराधिक मामले में जांच के निष्कर्ष पर आरोप पत्र दाखिल करने में विफल रहती है तो आरोपी वैधानिक जमानत पाने का हकदार हो जाता है।

विधि अधिकारी ने कहा कि इस मामले में सीबीआई ने प्राथमिकी दर्ज करने के 88वें दिन आरोप पत्र दायर किया और निचली अदालत ने आरोपी को वैधानिक जमानत दे दी और दिल्ली उच्च न्यायालय ने आदेश को बरकरार रखा।

डीएचएफएल के पूर्व प्रवर्तकों की ओर से पेश वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने अनुरोध किया कि सीबीआई की याचिका पर जवाब दाखिल करने के लिए कुछ समय दिया जाए।

पीठ ने दलीलों पर सहमति जताई और सीबीआई की याचिका को अगले साल नौ जनवरी को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध कर दिया।

इससे पहले 30 मई को दिल्ली उच्च न्यायालय ने करोड़ों रुपये के बैंक ऋण घोटाला मामले में डीएचएफएल प्रवर्तकों को दी गई वैधानिक जमानत को बरकरार रखा था।

उच्च न्यायालय ने पिछले साल तीन दिसंबर के निचली अदालत के आदेश को चुनौती देने वाली सीबीआई की याचिका खारिज कर दी थी और कहा था कि उन्हें जमानत देने का निर्णय ‘‘बेहतर तर्कों और कारणों’’ पर आधारित था।

अदालत ने यह भी कहा था कि एजेंसी द्वारा दायर आरोप पत्र अधूरा था और इसे जांच पर ‘‘अंतिम रिपोर्ट’’ बताकर आरोपी को वैधानिक जमानत देने से इनकार करना कानून और संविधान के खिलाफ होगा।

मामले में वधावन बंधुओं को पिछले साल 19 जुलाई को गिरफ्तार किया गया था। मामले में 15 अक्टूबर 2022 को आरोप पत्र दाखिल किया गया और इस पर संज्ञान लिया गया।

मामले में प्राथमिकी यूनियन बैंक ऑफ इंडिया द्वारा की गई एक शिकायत पर आधारित थी।

आरोप है कि डीएचएफएल, उसके तत्कालीन सीएमडी कपिल वधावन, तत्कालीन निदेशक धीरज वधावन और अन्य आरोपी व्यक्तियों ने यूनियन बैंक ऑफ इंडिया के नेतृत्व वाले 17 बैंकों के संघ को धोखा देने के लिए एक आपराधिक साजिश रची और आरोपियों एवं अन्य लोगों ने आपराधिक साजिश के तहत बैंकों के संघ को कुल 42,871.42 करोड़ रुपये के भारी ऋण स्वीकृत करने के लिए प्रेरित किया।

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