देश की खबरें | नकदी बरामदगी विवाद : विपक्षी सांसदों ने निष्पक्ष जांच की मांग की
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नयी दिल्ली, 24 मार्च दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश यशवंत वर्मा के सरकारी आवास से कथित तौर पर बड़ी मात्रा में नकदी मिलने की घटना पर विपक्षी नेताओं ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की और मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की।
कुछ विपक्षी नेताओं ने सुझाव दिया कि न्यायमूर्ति वर्मा के खिलाफ महाभियोग चलाया जाना चाहिए।
लुटियंस दिल्ली इलाके में 14 मार्च को न्यायमूर्ति वर्मा के सरकारी आवास के ‘स्टोर रूम’ में लगी आग को बुझाने के दौरान अग्निशमन कर्मियों और पुलिस कर्मियों को कथित तौर पर नकदी मिली थी।
भारत के प्रधान न्यायाधीश संजीव खन्ना ने आग लगने की घटना के बाद नोटों से भरी ‘‘चार से पांच अधजली बोरियां’’ मिलने की घटना की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति गठित की है।
हालांकि, न्यायमूर्ति वर्मा ने अपने ऊपर लगे आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि उनके या उनके परिवार के किसी भी सदस्य ने उनके आवास के स्टोर रूम में कभी कोई नकदी नहीं रखी।
घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया देते हुए आम आदमी पार्टी (आप) के राज्यसभा सदस्य संजय सिंह ने कहा, "यह एक बड़ा मुद्दा है, न्यायपालिका में लोगों का भरोसा टूट गया है।"
उन्होंने कहा, "भारत के इतिहास में यह पहली बार है, जब किसी न्यायाधीश के घर से नोटों की गड्डियां बरामद हुई हैं... उन्हें इस्तीफा दे देना चाहिए और मामले की जांच होनी चाहिए। संसद को भी इस मुद्दे पर चर्चा करनी चाहिए।"
संसद के बाहर संवाददाताओं से बातचीत में सिंह ने कहा, "जब कोई धनराशि बरामद नहीं होती, तब भी वे विपक्षी नेताओं को जेल में डाल देते हैं। (लेकिन इस मामले में) करोड़ों रुपये बरामद हुए हैं, फिर भी कोई जांच नहीं की जा रही है।"
कांग्रेस सांसद कार्ति चिदंबरम ने कहा कि प्रधान न्यायाधीश खन्ना द्वारा जांच समिति का गठन करना एक सकारात्मक कदम है। उन्होंने कहा कि सरकार को इस मुद्दे पर संसद में बयान देना चाहिए।
कार्ति ने कहा, "इस नकदी अग्निकांड की सच्चाई को सामने लाना भारत के प्रधान न्यायाधीश का कर्तव्य है... उन्होंने मामले की जांच के लिए न्यायाधीशों की तीन सदस्यीय समिति भी गठित की है। यह आगे बढ़ने का सबसे अच्छा तरीका है, लेकिन मुझे लगता है कि कानून मंत्री को भी संसद में बयान देना चाहिए।"
तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के सांसद कल्याण बनर्जी ने दावा किया कि न्यायपालिका में लोगों का भरोसा कम हो रहा है।
उन्होंने कहा, "न्यायपालिका में लोगों का विश्वास धीरे-धीरे कम होता जा रहा है। लोगों में विश्वास पैदा करना न्यायपालिका का कर्तव्य है। पहले हमने देखा है कि एक न्यायाधीश इस्तीफा देकर अगले ही दिन राजनीतिक पार्टी में शामिल हो जाते हैं, एक मुख्य न्यायाधीश सेवानिवृत्त होकर सांसद बन जाते हैं।"
बनर्जी ने कहा, "जांच शुरू हो गई है। यह भारत के प्रधान न्यायाधीश द्वारा उठाया गया एक अच्छा कदम है। अगर प्रधान न्यायाधीश चाहें, तो वह महाभियोग की सिफारिश कर सकते हैं। संसद भी महाभियोग के लिए कदम उठा सकती है।"
उन्होंने कहा, "सवाल यह है कि क्या इस तरह की बात से वाकई न्यायाधीशों का भ्रष्टाचार रुकेगा? कई आरोप हैं, लेकिन हम बोल नहीं सकते। अगर हम बोलेंगे, तो हम पर अवमानना का मुकदमा चलेगा। इस देश में समस्या यह है कि न्यायाधीशों को न्यायालय की अवमानना अधिनियम के तहत संरक्षण मिलता है और कोई भी उनके खिलाफ बोल नहीं सकता।"
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) के सांसद पी संदोष कुमार ने कहा कि न्यायाधीश पर महाभियोग चलाया जाना चाहिए।
भाकपा सांसद ने कहा, "भारत की संसद को उनके (न्यायमूर्ति वर्मा) खिलाफ महाभियोग चलाने के लिए कदम उठाना चाहिए। ऐसे लोगों को न्यायिक मामलों में शीर्ष पर बैठे देखना दुर्भाग्यपूर्ण और चौंकाने वाला है।"
आजाद समाज पार्टी (एएसपी) के सांसद चंद्रशेखर ने मांग की कि न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए न्यायिक सेवा आयोग का गठन किया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा, "हर सरकारी पद पर नियुक्ति के लिए परीक्षाएं होती हैं। तो फिर न्यायाधीश पद के लिए क्यों नहीं? कुछ परिवारों ने संस्था पर कब्जा कर लिया है... अब समय आ गया है कि कॉलेजियम प्रणाली को समाप्त कर अखिल भारतीय न्यायिक आयोग बनाया जाए।"
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