देश की खबरें | नकदी बरामदगी विवाद: न्यायाधीशों को संरक्षण संबंधी 1991 का फैसला फिर चर्चा में

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. उच्चतम न्यायालय ने दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश यशवंत वर्मा के सरकारी आवास से कथित रूप से जली हुई नकदी की गड्डियां मिलने के मामले में प्राथमिकी दर्ज करने संबंधी याचिका को खारिज करते हुए 1991 के अपने उस फैसले को केंद्र में ला दिया है, जिसके तहत न्यायाधीशों को संरक्षण प्रदान किया गया था।

नयी दिल्ली, 28 मार्च उच्चतम न्यायालय ने दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश यशवंत वर्मा के सरकारी आवास से कथित रूप से जली हुई नकदी की गड्डियां मिलने के मामले में प्राथमिकी दर्ज करने संबंधी याचिका को खारिज करते हुए 1991 के अपने उस फैसले को केंद्र में ला दिया है, जिसके तहत न्यायाधीशों को संरक्षण प्रदान किया गया था।

पांच-सदस्यीय की संविधान पीठ ने ‘‘के. वीरास्वामी बनाम भारत सरकार’’ मामले में निर्देश दिया था कि किसी उच्च न्यायालय के न्यायाधीश, किसी उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश या उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के खिलाफ तब तक कोई आपराधिक मामला दर्ज नहीं किया जाना चाहिए, जब तक कि उस मामले में भारत के प्रधान न्यायाधीश से परामर्श न कर लिया जाए।

संविधान के तहत केवल राष्ट्रपति और राज्यपालों को आपराधिक अभियोजन से छूट दी गई है।

संविधान पीठ द्वारा 1991 में दिये गये फैसले में संवैधानिक अदालतों के न्यायाधीशों को एक तरह से पूर्ण सुरक्षा प्रदान करते हुए कहा गया था, ‘‘...उच्च न्यायालय के न्यायाधीश, उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश या उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के विरुद्ध कोई भी आपराधिक मामला तब तक पंजीकृत नहीं किया जाएगा, जब तक कि प्रधान न्यायाधीश से परामर्श न कर लिया जाए...।’’

इसमें कहा गया था, ‘‘सरकार को प्रधान न्यायाधीश द्वारा व्यक्त की गई राय पर उचित ध्यान देना चाहिए। यदि प्रधान न्यायाधीश की राय है कि यह अधिनियम के तहत कार्यवाही के लिए उपयुक्त मामला नहीं है, तो मामला पंजीकृत नहीं किया जाना चाहिए। यदि प्रधान न्यायाधीश स्वयं वह व्यक्ति हैं, जिनके खिलाफ आपराधिक कदाचार के आरोप प्राप्त हुए हैं, तो सरकार उच्चतम न्यायालय के किसी अन्य न्यायाधीश या न्यायाधीशों से परामर्श करेगी।"

न्यायमूर्ति अभय एस ओका की अध्यक्षता वाली पीठ ने शुक्रवार को न्यायमूर्ति वर्मा के खिलाफ याचिका को ‘असामयिक’ करार देते हुए कहा कि आंतरिक जांच चल रही है और जांच पूरी होने के बाद प्रधान न्यायाधीश के पास कई विकल्प खुले होंगे।

कथित यौन उत्पीड़न के एक मामले का निस्तारण करते हुए शीर्ष अदालत ने 2014 में संवैधानिक अदालतों के न्यायाधीश के खिलाफ आरोपों की जांच के लिए आंतरिक प्रक्रिया निर्धारित की थी।

शीर्ष अदालत ने कहा कि आंतरिक प्रक्रिया के पहले चरण में शिकायत में निहित आरोपों की प्रथम दृष्टया सत्यता का पता लगाया जाएगा।

उच्चतम न्यायालय ने कहा था, ‘‘यदि ऐसा होता है, तो पहले चरण में यह तय किया जाएगा क्या गहन जांच की आवश्यकता है। पहले चरण में आरोपों की गहराई से जांच की आवश्यकता नहीं है। इसमें केवल शिकायत की विषय-वस्तु और संबंधित न्यायाधीश के जवाब के आधार पर आकलन की आवश्यकता है।’’

अदालत ने कहा था कि उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को केवल यह निर्धारित करना था कि क्या गहन जांच की आवश्यकता है। इसमें कहा गया, ‘‘यह संबंधित न्यायाधीश के जवाब पर विचार करके किए गए तार्किक आकलन के आधार पर किया जाना है...।’’

शीर्ष अदालत ने कहा था कि उच्च न्यायालयों के कार्यरत न्यायाधीशों से संबंधित आंतरिक जांच के दूसरे चरण के गंभीर परिणाम हो सकते हैं। इसमें कहा गया है कि दूसरे चरण की निगरानी कोई और नहीं बल्कि स्वयं प्रधान न्यायाधीश ही करेंगे।

यदि प्रधान न्यायाधीश उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश द्वारा व्यक्त इस विचार से सहमत होते कि इसमें गहन जांच की आवश्यकता है, तो वे एक ‘‘तीन सदस्यीय समिति’’ का गठन करेंगे, जो प्रक्रिया को दूसरे चरण में ले जाएगी।

इस समिति में एक उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के अलावा, दो उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीश (संबंधित उच्च न्यायालय के अलावा) शामिल होंगे। दूसरे चरण में गहन जांच की बात कही गई।

शीर्ष अदालत ने कहा था कि यद्यपि तीन-सदस्यीय समिति अपनी प्रक्रिया तैयार करने के लिए स्वतंत्र है, लेकिन अंतर्निहित आवश्यकता यह है कि प्रक्रिया प्राकृतिक न्याय के नियमों के अनुरूप हो।

इसमें कहा गया है, ‘‘पहली बार जांच के आधार पर आरोपों की प्रामाणिकता की जांच की जाएगी। तीन-सदस्यीय समिति के पदाधिकारियों का संबंधित न्यायाधीश के साथ कोई संबंध नहीं होगा। न केवल संबंधित न्यायाधीश को अपने खिलाफ लगाए गए आरोपों को खारिज करने का उचित अवसर मिलेगा, बल्कि शिकायतकर्ता को भी संतुष्टि होगी कि जांच अनुचित नहीं होगी। पक्षपात, पूर्वाग्रह या पक्षपात को बाहर रखने के लिए आंतरिक प्रक्रिया तैयार की गई थी।’’

समिति को अपनी जांच पूरी होने पर अपने निष्कर्ष दर्ज करने और उसके बाद मुख्य न्यायाधीश को रिपोर्ट सौंपनी थी।

अदालत ने कहा था कि रिपोर्ट से या तो यह निष्कर्ष निकल सकता है कि न्यायाधीश के खिलाफ लगाए गए आरोपों में कोई तथ्य नहीं है या फिर आरोपों में पर्याप्त तथ्य है।

इसमें कहा गया था, ‘‘ऐसी स्थिति में, तीन सदस्यीय समिति को आगे यह राय देनी होगी कि क्या संबंधित न्यायाधीश के खिलाफ लगाया गया कदाचार इतना गंभीर है कि संबंधित उसे हटाने की कार्यवाही शुरू करने की आवश्यकता है; या फिर शिकायत में निहित आरोप इतने गंभीर नहीं हैं कि संबंधित न्यायाधीश को हटाने के लिए कार्यवाही शुरू करने की आवश्यकता हो।’’

समिति यदि इस निष्कर्ष पर पहुंचती है कि कदाचार इतना गंभीर नहीं है कि न्यायाधीश को हटाने की कार्यवाही शुरू की जा सके, तो मुख्य न्यायाधीश, न्यायाधीश को सलाह देंगे, तथा समिति की रिपोर्ट को रिकॉर्ड में रखने का निर्देश भी दे सकते हैं।

शीर्ष अदालत ने कहा था, ‘‘यदि समिति इस निष्कर्ष पर पहुंचती है कि आरोपों में तथ्य हैं, तो कार्यवाही शुरू करने के लिए, संबंधित न्यायाधीश को हटाने के लिए, सीजेआई निम्नानुसार आगे बढ़ेंगे: - (1) संबंधित न्यायाधीश को सीजेआई द्वारा इस्तीफा देने या स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेने की सलाह दी जाएगी। (2) यदि संबंधित न्यायाधीश सीजेआई की सलाह को स्वीकार नहीं करता है, तो सीजेआई संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से यह अपेक्षा करेंगे कि वे संबंधित न्यायाधीश को कोई न्यायिक कार्य आवंटित न करें।’’

इसमें कहा गया है कि यदि संबंधित न्यायाधीश सीजेआई की इस्तीफा देने की सलाह का पालन नहीं करते हैं, तो सीजेआई राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री को समिति के निष्कर्षों से अवगत कराएंगे, जिसके आधार पर महाभियोग शुरू किया जा सकता है।

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